बेंगलुरु की 87 वर्षीय थंगम कृष्णन एक गृहिणी रही हैं और अपने परिवार—जिसमें उनके पति और तीन बच्चे शामिल हैं—की ज़िंदगी में बहुत सक्रिय रूप से जुड़ी रही हैं। 70 के दशक के मध्य तक उन्होंने बहुत आज़ाद ज़िंदगी जी थी; उन्हें नमकीन और मिठाइयाँ बनाने का शौक था और उनका लोगों से बहुत मिलना-जुलना था। वे बताती हैं कि उन्हें पार्किंसंस होने का कैसे पता चला और वे कैसे परिवार के भरपूर सहयोग से मज़बूत बनी रहीं, साथ ही अपने बेटे-बेटी और उनके बच्चों, बहुओं और दामाद की ज़िंदगी में भी शामिल रहीं। हालाँकि पार्किंसंस ने उनके चलने-फिरने पर असर डाला है, लेकिन उनके कभी हार न मानने वाले जज़्बे ने उन्हें परिवार की ज़िंदगी का अहम हिस्सा बने रहने में मदद की है।
कृपया हमें अपनी बीमारी और उसके निदान के बारे में बताएं।
साल 2009 में बैंगलोर के एक डॉक्टर ने मुझे पार्किंसंस रोग का निदान दिया। बैंगलोर आने से पहले, जब मैं मुंबई में थी, मेरे दाहिने हाथ में कुछ कंपन का अनुभव हुआ और मैं कुछ बार मामूली रूप से गिर भी गई थी। जब मैंने अपनी बेटी को यह बताया, तो उसने मुझे बैंगलोर में किसी डॉक्टर को दिखाने के लिए कहा। मैं एक ऑर्थोपेडिक सर्जन से मिली और उन्होंने मुझे बताया कि यह समस्या पार्किंसंस से जुड़ी है। उन्होंने मुझे बैंगलोर के जाने-माने पार्किंसंस स्पेशलिस्ट डॉ. मुथाने से मिलने की सलाह दी।
यह सब कैसे शुरू हुआ? आपके शुरुआती लक्षण क्या थे? इनमें से कौन से लक्षण सबसे ज़्यादा परेशान करने वाले थे?
जैसा कि मैंने पहले बताया है, मेरे हाथों में कंपन के अनुभव से मुझे चिंता हुई। साथ ही, चलते समय कभी-कभी मुझे अपने पैरों पर नियंत्रण की कमी महसूस होती थी। मुझे यह भी लगा कि मेरी लिखावट छोटी होती जा रही थी और सीधी लाइन में वाक्य लिखना मुश्किल हो रहा था। जब मैं तेज़ी से लिखने की कोशिश करती थी, तो अक्षर एक-दूसरे के ऊपर चढ़ जाते थे। आत्मविश्वास के साथ न चल पाना सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात थी।
आपको निदान कब दिया गया? निदान मिलने पर आपकी क्या प्रतिक्रिया थी?
मैं 5 मई, 2009 को न्यूरो स्पेशलिस्ट से मिली, उसी दिन जब मेरे पहले डॉक्टर ने मुझे उनसे कंसल्ट करने के लिए कहा था। पिछले डॉक्टर की सलाह मुझे उनके क्लिनिक में चलते हुए देखने के आधार पर थी। ये न्यूरोलॉजिस्ट एक मूवमेंट डिसऑर्डर स्पेशलिस्ट हैं। लगभग 10 मिनट तक मेरी जांच करने के बाद, उन्होंने मुझे बताया कि मुझे पार्किंसंस रोग है। मुझे लगा कि मुझ में कुछ भी गड़बड़ नहीं है और क्योंकि मुझे इस बीमारी के बारे में पता नहीं था, इसलिए मैंने इस निदान को ज़्यादा अहमियत नहीं दी। साथ ही, मैंने उनके दूसरे मरीज़ों को देखा जिनमें लक्षण कहीं अधिक गंभीर थे (जैसे चलने में असमर्थता, हाथ या पैर का बिना कंट्रोल के हिलना)। मुझे लगा कि मुझे तो ऐसी कोई खास प्रॉब्लम नहीं है।
क्या परिवार में पार्किंसंस बीमारी का कोई इतिहास रहा है?
नहीं। जहाँ तक मुझे पता है, ऐसा नहीं है। मेरे पिता को 57 साल की उम्र में लकवा (पैरालिटिक स्ट्रोक) हुआ था, जिससे वे ठीक हो गए थे और 75 साल की उम्र तक जीवित रहे। मेरी माँ को भी पार्किंसंस नहीं था। परिवार के किसी और सदस्य को पार्किंसंस होने की भी मुझे कोई जानकारी नहीं है।
शुरुआती इलाज क्या था? और समय के साथ इलाज में क्या बदलाव हुआ है?
मैं 2009 से एक ही दवा ले रही हूँ। पर दवा की मात्रा और दिन में कितनी बार लेना है, यह बढ़ा है। लगभग दस साल पहले, मुझे नींद आने में दिक्कत हो रही थी। मेरी दवाओं में क्लोनाज़ेपैम 0.25 एमजी शामिल कर दी गई। जब मुझे ज़्यादा डिस्किनेसिया (मांसपेशियों में अनचाही हरकतें) महसूस होता था, तो समय-समय पर दवा में थोड़ा बदलाव किया जाता था। मेरे न्यूरो स्पेशलिस्ट डॉक्टर, डॉ. मुथाने, बैंगलोर में थे, पर क्योंकि मैं बैंगलोर और मुंबई दोनों जगह रहती थी, इसलिए हमने मुंबई में भी एक डॉक्टर से सलाह लेने का फ़ैसला किया था। 2011 में, एक बार मुंबई के एक डॉक्टर ने मेरी एक दवा बदल दी थी। इस दवा का एक संभावित दुष्प्रभाव मतिभ्रम (हैल्यूसिनेशन) था और बैंगलोर लौटने पर मुझे एक बार मतिभ्रम का अनुभव हुआ।
मैं रात 2:30 बजे नहाने के लिए उठी थी और मुझे लगा कि घर में चूहे हैं और चोरी हो रही है। बैंगलोर में मेरे बेटे, बहु और बेटी मुझे वापस डॉ. मुथाने के पास ले गए। उन्होंने तुरंत नई दवा बंद कर दी पर उस का असर खत्म होने में कुछ दिन लग गए। साथ ही, उन्होंने कुछ हफ़्तों तक डोपामाइन बढ़ाने वाली सभी दवाओं की मात्रा कम कर दी,जब तक कि उन्हें यह भरोसा नहीं हो गया कि नई दवा की वजह से हुए ओवरडोज़ का असर कम हो गया है।
तकरीबन 2012में हुई उस घटना के बाद से, ओवरडोज़ या किसी दवा से कोई बुरा रिएक्शन नहीं हुआ है और मतिभ्रम की स्थिति में जाने के डर से दवा की मात्रा भी नहीं बढ़ाई गई है। जिस दवा से मुझे मतिभ्रम हुआ था,उसके बारे में बताया गया था कि कुछ मरीज़ों में उसका यह साइड इफ़ेक्ट हो सकता है। जब मैंने उसे लेना बंद कर दिया,तो यह समस्या दोबारा नहीं हुई।
क्या आपकी मुख्य बीमारी, पार्किंसंस की वजह से कोई अन्य दिक्कतें हुईं और आपका पार्किंसंस किस स्टेज पर? आपने यह सब कैसे संभाला?
मुझे कभी-कभी कब्ज़ की समस्या होती है; मुझे बताया गया है कि पार्किंसंस के मरीज़ों को यह समस्या होती है। यह समस्या बहुत गंभीर नहीं है, और जब मुझे कुछ तकलीफ महसूस होती है, तो मैं हरे केले और काली किशमिश खा लेती हूँ।
इस बीमारी का आप पर शारीरिक और मानसिक रूप से क्या असर पड़ा?
शारीरिक रूप से ज़्यादा असर नहीं पड़ा है। मेरे पैरों और शरीर में होने वाली अनचाही हरकत की मुझे आदत हो गई है और मैंने इसे धीरे-धीरे स्वीकार कर लिया है। मानसिक रूप से, मेरा चलने-फिरने का आत्मविश्वास कम हो गया था और मुझे हमेशा इस बात की चिंता रहती थी कि कहीं मैं व्हीलचेयर तक सीमित न रह जाऊँ या बिस्तर पर न पड़ जाऊँ।
पार्किंसंस का पता चलने के बाद के पहले कुछ सालों में, मैं अपने काम और समय का प्रबंधन बिना किसी खास देखरेख के खुद ही कर लेती थी। मैं काफी आत्मविश्वास के साथ चल-फिर सकती थी और परिवार से मुझे बहुत कम मदद की ज़रूरत पड़ती थी। पर जैसे-जैसे बीमारी बढ़ी, मुझे ज़्यादा समय तक बैठे रहना पड़ता था या मैं चल-फिर नहीं पाती थी, और इससे मुझे निराशा होने लगी।
मेरे परिवार ने मेरा हौसला बनाए रखने और इस बीमारी का सामना करने के लिए मुझे आत्मविश्वास देने के लिए कई चीज़ें कीं, जैसे मेरे लिए चॉकलेट, बिस्कुट और आइसक्रीम लाना, क्योंकि मुझे कोई और बीमारी या स्वास्थ्य समस्या नहीं थी जिस से मेरे खाने पर कोई रोक-टोक हो ।
आप अभी कौन सी दवाएँ ले रही हैं?कृपया सभी एलोपैथिक दवाएं और सप्लीमेंट के बारे में बताएं,
लेवोडोपा और कार्बोडोपा 110 (दिन में 6 बार, हर बार 1.5 गोली)
एंटाकैपोन 200 (दिन में 6 बार, आधी गोली)
अमीनो एसिड और न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट (दिन में 1 बार)
मल्टीविटामिन बी-कॉम्प्लेक्स, विटामिन सी और कैल्शियम (दिन में 1 गोली)
फोलिक एसिड (दिन में 1 गोली)
क्लोनाज़ेपम (रात में 2 गोलियाँ, हर एक 0.25एमजी की)
अमांटाडाइन (दिन में तीन बार, 1/4 गोली)
कैल्शियम, विटामिन डी और फोलिक एसिड (दोपहर के खाने के बाद 1 गोली)
मल्टीविटामिन (हर दूसरे दिन)
क्या आपने कॉम्प्लिमेंट्री मेडिसिन या थेरेपी आज़माई है? अगर हाँ, तो क्या उससे कोई फ़ायदा हुआ?
नहीं।
आप किस तरह के स्पेशलिस्ट (जैसे फ़िज़ियोथेरेपिस्ट/ ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट/ साइकियाट्रिस्ट वगैरह) से सलाह लेती हैं और कितनी बार?
मैंने सिर्फ़ फ़िज़ियोथेरेपिस्ट और पार्किंसंस स्पेशलिस्ट से सलाह ली है। हफ़्ते में 2 बार फ़िज़ियोथेरेपी और साल में 2 से 3 बार पार्किंसंस स्पेशलिस्ट से मिलना होता है।
पार्किंसंस रोग वाले लोगों के लिए रिहैबिलिटेशन बहुत ज़रूरी है। आप इसे कैसे मैनेज करती हैं? अपने लिए सही विकल्प खोजने में आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
फ़िज़ियोथेरेपी सेशन के अलावा कोई खास रिहैबिलिटेशन नहीं हुआ है। हाँ, मुझे अब फ़ुल-टाइम केयरटेकर की जरूरत रहती है, और केयरटेकर मेरी मदद करते हैं और मुझे घुमाने भी ले जाते हैं।
इस बीमारी की वजह से आपने अपनी जीवनशैली में क्या बदलाव किए हैं?
शुरुआत में जब बीमारी कम गंभीर थी, और अगर रसोई में जब खाना पकाने का मन होता था तो मेरे साथ हमेशा कोई होता था। मेरे परिवार में सभी (बेटे-बेटी, उनके जीवनसाथी और बच्चे) ने मुझे बहुत सहारा दिया है।
बीमारी की प्रकृति के कारण मुझे जबरन कुछ बदलाव करने पड़े हैं। मैं तभी टहलने की कोशिश करती हूँ जब दवा लेने के बाद मैं "ऑन" (दवा का असर होने की स्थिति) महसूस करती हूँ। मैंने यह पहचानना सीख लिया है कि दवा का असर कब खत्म हो रहा है, और उस समय मैं ज़्यादातर हिलती-डुलती या टहलती नहीं हूँ। आम तौर पर, दिन चढ़ने के साथ मेरी हालत और खराब हो जाती है। मैंने शारीरिक गतिविधियों से अपना ध्यान हटाने के लिए बहुत पढ़ना शुरू कर दिया है।
मेरे लिए एक बड़ा बदलाव साड़ी छोड़कर सलवार पहनना था। साथ ही, रात में डायपर पहनना ताकि अगर मुझे अचानक टॉयलेट जाना पड़े तो कोई दिक्कत न हो।
मैं समय-समय पर पार्किंसंस के स्पेशलिस्ट के पास जाती थी, जो मेरी जांच करतेऔर स्थिति का आकलन करते थे, दिमाग को सक्रिय रखने के तरीके बताते थे और मुझे भरोसा दिलाते थे कि मेरी बीमारी की प्रगति धीमी है।
आप अपनी दैनिक गतिविधियां कैसे करती हैं/करती थीं? आप किस तरह की नर्सिंग या अटेंडेंट की मदद लेती हैं? इस मदद लेने में आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा है?
शुरू में मेरी गति धीमी थी लेकिन मैं चल-फिर सकती थी और मेरा संतुलन भी नहीं बिगड़ता था। जब डॉक्टर को लगा कि अगर कोई मेरी गतिविधियों पर नज़र रखे तो बेहतर होगा,तो मैंने और मेरे परिवार ने 24/7 केयरटेकर (देखभाल करने वाले) को रखने का फ़ैसला किया।
2017-2018 से मैं 24/7 देखभाल करने वाले केयरटेकर की सेवाएँ ले रही हूँ। केयरटेकर मुझे रोज़ टहलने के लिए बाहर ले जाते हैं। रास्ते में मुझे कोई पड़ोसी या समुदाय के लोग मिल जाते हैं जो मुझसे बातचीत करता है, और उनमें से कई लोग मेरे हौसले की तारीफ़ करते हैं।
हर कुछ समय के बाद केयरटेकर बदलना होता है। जब ऐसा होता है, तो मैं थोड़ा घबरा जाती हूँ। अच्छी बात यह है कि मैं अपने केयरटेकर साथ अच्छा तालमेल बना पाती हूँ। जब तक मुझे नए केयरटेकर पर भरोसा नहीं हो जाता, मेरा बेटा करीब रहता है और स्थिति पर नज़र रखता है। कभी-कभार जब केयरटेकर के साथ कुछ मतभेद होता है, तो मेरा बेटा यह सुनिश्चित करता है कि मेरी बात सुनी जाए और केयरटेकर मेरी बात माने। जब केयरटेकर नए होते हैं तो सबसे बड़ी चिंता यह होती है कि वे दवाएँ देना न भूलें, क्योंकि इससे मेरे चलने-फिरने की क्षमता पर काफ़ी असर पड़ सकता है।
डोपामाइन कम होने की वजह से, पार्किंसंस के मरीज़ों में अक्सर डिप्रेशन के लक्षण दिखाई देते हैं। आप इससे कैसे निपटती हैं? क्या आपने मदद के लिए किसी काउंसलर से बात की?
नहीं, मुझे डिप्रेशन के कोई खास लक्षण महसूस नहीं हुए हैं। मुझे परिवार का सहारा बहुत मज़बूत रहा है और मैं सकारात्मक सोच रखती हूँ। मैं निरंतर प्रार्थना करती हूँ और दुआ मांगती हूँ कि इस बीमारी का सामना करने के लिए मुझे हिम्मत मिले।
आपके परिवार ने आपका साथ कैसे दिया है?
मुझे हमेशा से उनका भरपूर सहारा मिला है। मैंने एक भी दिन अकेले नहीं बिताया है। मेरे बेटे-बेटी, उनके जीवनसाथियों और बच्चों ने मुझे कभी भी बीमार होने का एहसास नहीं होने दिया; इस सब से मुझे जीने की हिम्मत मिली है।
शुरू के सालों में जब टीवी देखते-देखते मैं ऊबने लगी —क्योंकि मेरा कोई और शौक नहीं था—तो मेरे पोते, ने मुझे किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित किया। यह लगभग 8 साल पहले की बात है। शुरुआत में उसने मुझे पढ़ने के लिए हैरी पॉटर की किताबें दीं। वह हर शाम मुझसे पूछता था कि मैंने कितना पढ़ा है और जो मैंने पढ़ा होता, उस पर मुझसे सवाल भी करता था। मैं अपने पोते के सामने बिना तैयारी के नहीं नजर आना चाहती थी, इसलिए शुरू में मैंने इन किताबों को ऐसे पढ़ा जैसे कोई परीक्षा दे रही हूँ; धीरे-धीरे पढ़ना मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया। पिछले 8 सालों में मैंने 100 से ज़्यादा किताबें पढ़ी हैं और मैं रोज़ कम से कम 4 से 6 घंटे पढ़ने में बिताती हूँ। हर किताब मुझे या तो मेरा बेटा देता है या मेरा पोता, और किताब खत्म करने पर मुझे एक तरह की कामयाबी का एहसास होता है। 'गॉडफ़ादर' मेरी पसंदीदा किताबों में से एक है और मेरे पोते ने मुझे उसके साथ इसकी फ़िल्म भी दिखाई। मैंने यह किताब तीन बार पढ़ी है। जब मैं मुंबई जाती हूँ, तब भी यही सिलसिला चलता रहता है।
हर सुबह और दिन में कुछ बार मेरा पोता मेरे साथ कुछ समय बिताता है और पूछता है कि मैं कैसी हूँ; अगर मैं कोई नकारात्मक बात कहती हूँ, तो वह मुझे भरोसा दिलाता है कि मैं ठीक हूँ।
खाना बनाना मेरा सबसे बड़ा शौक हुआ करता था। खाना न बना पाना मेरे लिए बहुत निराशाजनक था, इसलिए कभी-कभी मेरा बेटा मुझे किचन में ले जाता है; वह खाना बनाता है और मैं उसपर नजर रखती हूँ। जब मेरा बेटा मिठाई या नमकीन बनाता है, तो हम उसे पड़ोसियों को ज़रूर देते हैं। हम उन्हें बताते हैं कि यह मेरी देखरेख में बना है और मुझे यह अच्छा लगता है। मेरी बेटी के घर पर, वह मुझे अपने रसोइए को अपनी पसंद की कोई भी चीज़ बनाने के लिए कहने के लिए प्रोत्साहित करती है।
मेरे बेटे के दोस्त जब हमारे घर आते हैं, वे मुझे मिलने मेरे कमरे में भी आते हैं और कुछ देर मुझसे बातें करते हैं। इससे मुझे लगता है कि मेरी ज़रूरत है और मैं घर का ही एक हिस्सा हूँ।
हम घर में हर किसी का जन्मदिन मनाते हैं, यहाँ तक कि केयरटेकर का भी; ठीक वैसे ही जैसे मेरी बहू हर धार्मिक त्योहार को ज़रूर मनाती है। इन मौकों पर क्या बनाना है, इसके लिए मेरा परिवार मुझसे सलाह लेता है और अगर कोई महत्वपूर्ण घटना हो, तो वे मुझसे उस के लिए शुभ दिन और समय देखने के लिए कहते हैं।
मेरा बेटा मुझे हफ़्ते में दो बार व्हीलचेयर पर बिठाकर बिल्डिंग के बेसमेंट में बने सुपरमार्केट में ले जाता है,जहाँ मैं लगभग 30 मिनट तक सब्ज़ियाँ, फल और बिस्कुट खरीदती हूँ; यह मेरे लिए बाहर घूमने जैसा होता है।
मेरे पोते-पोतियाँ भी मुझसे समय-समय पर मुझसे बात करते रहतेहैं और मुझे उनका ऐसे मुझपर ध्यान देना अच्छा लगता है। और मेरी नवासी, जो हर महीने बैंगलोर आती है, वह मेरे साथ समय बिताती है, मेरे लिए मेरा पसंद का जंक फ़ूड लाती है और मुझ से बहुत लाड़-प्यार करती है।
आपके परिवार को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा है और उन्होंने उनका सामना कैसे किया?
उन्होंने मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं होने दिया कि कोई चुनौती है।
अपनी बीमारी को संभालने के दौरान आपने ऐसी कौन सी बात सीखी, जिसके बारे में आप सोचती हैं कि आपको पहले से पता होता तो अच्छा रहता?
अभी ऐसा कुछ याद नहीं आ रहा। यह एक प्रगतिशील बीमारी है और मुझे इस बात से राहत मिलती है कि मैं आगे की सोचकर परेशान नहीं होती हूँ। मैं हर दिन बस उसी दिन पर ध्यान देती हूँ।
ऐसी ही चुनौतियों का सामना कर रहे मरीज़ों के लिए आपकी क्या सलाह है?
ऐसे शौक अपनाएं जिनमें ज़्यादा भाग-दौड़ न करनी पड़े, भगवान से प्रार्थना करें और जो भी मदद मिले, उसे स्वीकार करें।
आपको भविष्य को लेकर किस बात की चिंता है?
मुझे इस बात की चिंता है कि मैं बिस्तर पर पड़ जाऊँगी।
मैं आशा करती हूँ कि आने वाले सालों में इस बीमारी का इलाज हो पाएगा ताकि लोग बेहतर ज़िंदगी जी सकें।
