2006 में प्रज्ञा प्रसून सिंह पर एक आदमी ने तेजाब से हमला किया। उन्हें इससे उबरने के लिए अपने परिवार से बहुत ज़्यादा सपोर्ट और कई सर्जरी की जरूरत पड़ी है। इस अनुभव के कारण उन्होंने अतिजीवन फ़ाउंडेशन नामक संस्थान को स्थापित किया जो झुलसने से जूझने वालों के सम्पूर्ण रिहैबिलिटेशन पर केंद्रित है। वे इसके लिए स्किन डोनेशन (त्वचा दान) को एक ज़रूरी रिकवरी उपाय के तौर पर बढ़ावा भी दे रही हैं।
आप पर एसिड अटैक (तेजाब से हमला) हुआ था। कृपया हमें उसके बारे में कुछ बताएं।
मुझ पर 2006 में, मेरी शादी के 12 दिन बाद, जब मैं ट्रेन में सो रही थी, तो एक आदमी (जिसे मैंने पहले ठुकराया था) ने मुझ पर तेजाब फैंका। उस एक पल ने मेरी ज़िंदगी पूरी तरह बदल दी। मेरा चेहरा, गर्दन और शरीर का ऊपरी हिस्सा बुरी तरह झुलस गए थे। मैं सामान्य जरूरी काम कर सकूँ, इस की क्षमता वापस पाने के लिए भी मुझे कई सर्जरी करवानी पड़ीं। लेकिन शारीरिक पीड़ा से ज़्यादा दुख मुझे इस घटना के बाद समाज से नकारे जाने से हुआ। भावनात्मक तौर से यह एक अत्यन्त भयानक आघात था।
कृपया हमें बताएं कि ट्रीटमेंट क्या हुआ, और कितने समय तक चला?
मेरा ट्रीटमेंट कई साल चला और अभी भी जारी है। मैंने कई पुनर्निर्माण सर्जरी (रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी) करवाईं, जिसमें त्वचा प्रत्यारोपण (स्किन ग्राफ्ट) और लेज़र ट्रीटमेंट शामिल थे। ठीक होने की प्रक्रिया लंबी, पीड़ा से भारी, और महंगी थी। यह सिर्फ़ शारीरिक रूप से ठीक होने के बारे में नहीं थी — मुझे फिर से जीना सीखने, अपना आत्मविश्वास फिर से बनाने और हिम्मत के साथ सामाजिक दायरे में फिर से शामिल होने के लिए प्रयत्न करना था।
क्या आपको अपने परिवार और दोस्तों का सहारा मिला?
सच्चे दोस्त कौन हैं यह तो मुसीबत के समय में ही पता चलता है। इस दौरान मेरा परिवार मेरी सबसे बड़ी ताकत था। मेरे पति, माता-पिता और भाई-बहन इस भयानक समय में मेरे साथ खड़े रहे। उनके निःस्वार्थ प्रेम ने मुझे चलते रहने की हिम्मत दी।
पर कुछ दोस्त और रिश्तेदार ऐसे भी थे जो इस घटना के बाद दूर रहने लगे। मुझे मेरी सूरत की वजह से शादी-ब्याह या अन्य आयोजनों में नहीं बुलाया जाता था।मैंने हमलों से जूझने वाले ऐसे कई लोग देखे हैं जिन्हें मेरे जैसे सपोर्ट नहीं मिली — और इसी बात ने मुझे एक ऐसा मंच बनाने के लिए प्रेरित किया जहां ऐसे लोग कभी अकेला महसूस न करें।
कृपया अपने वर्तमान स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति के बारे में बताएं।
स्वास्थ्य के लिहाज से, मुझे अभी भी समय-समय पर ट्रीटमेंट की जरूरत रहती है. मैं कॉन्ट्रैक्चर (मांसपेशियाँ, टेंडन, त्वचा आदि में संकुचन जिस के कारण व्यक्ति जोड़ों को ठीक से हिला नहीं पाते) की वजह से कुछ चुनौतियों का सामना करती हूं, जैसे त्वचा में कसाव, अधिक संवेदनशीलता, और कभी-कभी दर्द होना।
मानसिक रूप से मैं पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत महसूस करती हूं। मैंने अपने जलने के निशानों को अपनी पहचान का हिस्सा मान लिया है। वे मुझे मेरी ताकत की याद दिलाते हैं, मेरी पीड़ा की नहीं। अब मेरा मकसद है ऐसे हमलों से जूझने वाले दूसरे लोगों को ठीक होने में मदद करना – शारीरिक रूप से और भावनात्मक रूप से।
कृपया हमें अपने संस्थान, अतिजीवन के बारे में बताएं।
अपने इस निजी सफ़र से मुझे अतिजीवन फाउंडेशन शुरू करने की प्रेरणा मिली। ठीक होने की प्रक्रिया के दौरान मुझे एहसास हुआ कि तेजाब हमले के बाद व्यक्ति के लिए चिकित्सा, उचित देखभाल, भावनात्मक सहारा, और रोज़गार के मौके पाना कितना मुश्किल होता है। मैंने 2013 में अतिजीवन फाउंडेशन शुरू किया। यह संस्था हमले से जूझने वालों की पहल है जिसका उद्देश्य है तेजाब हमले और झुलसने की घटनाओं से जूझने वालों को फिर से इज्ज़त और आज़ादी के साथ ज़िंदगी जी पाने में मदद करना।
अतिजीवन के काम के बारे में कुछ बताएं।
अतिजीवन रिहैबिलिटेशन के सभी क्षेत्रों में कार्य करता है— जिसमें शामिल हैं चिकित्सीय उपचार, पुनर्निर्माण सर्जरी, मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग, कौशल का विकास, और आर्थिक पुनर्वास। हम ऐसिड अटैक से जूझ रहे व्यक्ति के सम्पूर्ण पुनर्वास के लिए सहायता प्रदान करते हैं।इसके
अतिरिक्त, हम ऐसिड अटैक संबंधी जागरूकता और बचाव संबंधी अभियान भी चलाते हैं। हम जिन व्यक्तिओं पर तेजाब से हमला हुआ है, उनके अधिकारों की वकालत करते हैं, और कंपनियों से मिल कर ऐसे व्यक्तियों लिए रोजगार उपलब्ध करवाने की कोशिश करते हैं। हमने भारत में 500 से ज़्यादा ऐसे व्यक्तियों को अपनी ज़िंदगी फिर से बनाने में मदद की है।
स्किन डोनेशन (त्वचा दान) के बारे में आपकी क्या राय है और दूसरे अंगों के दान (ऑर्गन डोनेशन) के मुकाबले इसकी क्या स्थिति है?
स्किन डोनेशन अन्य ऑर्गन डोनेशन जितना ही ज़रूरी है, खासकर जलने और झुलसने के केस में। आम लोग अक्सर यह नहीं जानते कि बुरी तरह जलने वालों की जान ऐसी दान की गयी त्वचा से बचाई जा सकती है। कई अंग मौत से पहले या तुरंत बाद ही डोनेट किए जा सकते हैं, पर त्वचा का दान मौत के 6 घंटे के अंदर किया जा सकता है, और फिर इसे भविष्य में इस्तेमाल के लिए स्टोर किया जा सकता है। अफसोस, भारत में स्किन डोनेशन के बारे में जागरूकता बहुत कम है।
अतिजीवन में हम त्वचा दान के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए “डोनेट स्किन, सेव लाईवस” (त्वचा दान करें, जानें बचाएं) नामक अभियान चलाते हैं। जलने/ झुलसने के केस में यह दान ज़िंदगी और मौत के बीच का फ़र्क हो सकता है।
स्किन डोनेशन परस्किन डोनेशन करने का प्रबंध बहुत कम अस्पतालों में होता है। हम ऐसे हॉस्पिटल कैसे ढूंढें जहां हम त्वचा डोनेट कर सकते हैं?वर्तमान में, देश में लगभग 29 स्किन बैंक हैं। यह संख्या जरूरत के मुकाबले बहुत कम है। हमें सच में हर ज़िले में एक स्किन बैंक की ज़रूरत है ताकि स्किन बैंक की टीम डोनर के घर मौत के 4-6 घंटे के अंदर पर पहुंच सके, क्योंकि डोनर की त्वचा निकालने की प्रक्रिया इसी समय की खिड़की में होनी चाहिए। अगर आप किसी बड़े शहर में हैं, तो आप डोनेशन की प्रक्रिया के लिए सीधे पास के स्किन बैंक से संपर्क कर सकते हैं। अफसोस, गांवों और छोटे शहरों में, आवश्यक सुविधाओं और प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की कमी के कारण स्किन डोनेशन अभी भी मुमकिन नहीं है। इसके अलावा, स्किन डोनेशन के बारे में अधिक जागरूकता फैलाने की बहुत ज़रूरत है। बहुत कम लोग जानते हैं कि मरने के बाद त्वचा दान संभव है और इससे जलने के मरीज़ों की जान बच सकती है। हमें लोगों को अंग और त्वचा दान, दोनों का प्रण लेने के लिए बढ़ावा देना चाहिए, और यह जानकारी शेयर करनी चाहिए कि यह नेक काम दूसरों को फिर से सामान्य ज़िंदगी जीने में कैसे मदद कर सकता है। संबंधित लेख: घर पर मौत के बाद टिशू डोनेशनयह भी पढ़ें: हमने अपनी माँ की स्किन डोनेट की |
देश में एसिड अटैक से जूझने वाले उत्तरजीवियों (सर्वाइवर्स) के पुनर्वास के लिए कितना काम हो रहा है? इस में किन कमियों को पूरा करने की ज़रूरत है?
हालांकि इस क्षेत्र में तरक्की हुई है, खासकर मेडिकल सपोर्ट और कानूनी मदद में, लेकिन रिहैबिलिटेशन संबंधी सपोर्ट और संसाधन अभी भी बिखरे हुए हैं। घटनाओं से जूझ रहे व्यक्तियों के लिए व्यवस्थित, दीर्घकालिक सहायता की कमी है — खासकर मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य देखभाल, रोजगार, और समाज में पुनः एकाग्रित होने जैसे क्षेत्रों में। हमें अधिक संस्थागत तंत्र, नीति के स्तर पर समावेशन, और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (सार्वजनिक-निजी भागीदारी) की ज़रूरत है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि लोगों का न सिर्फ इलाज हो, बल्कि उनका वास्तव में पुनर्वास और सशक्तिकरण हो पाए।
मेडिकल ट्रीटमेंट के अलावा, ऐसी हमलों से जूझने वालों के लिए और किस तरह का उपचार किया जाता है? ऐसे केस में लोगों पर दीर्घकाल में किस तरह के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे हो सकते हैं?
ऐसे हमले के बाद ठीक होने की क्रिया सिर्फ शरीर ठीक करने की नहीं, बल्कि जीवन के हर पहलू से संबंधित होती है। हम उनके आत्मविश्वास के पुनः निर्माण के लिए मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग, अपने जैसे लोगों के समुदाय से सहायता, और पुनर्वास के लिए आवश्यक कौशल के विकास के लिए प्रशिक्षण देते हैं।
दीर्घ-काल में, ऐसे लोगों को अनेक चुनौतियाँ का सामना करना पड़ता है, जैसे कि – देखने की क्षमता में कमी, सांस लेने में दिक्कत, सुनने की क्षमता में कमी, नथुनों की संरचना में विकार, और कॉन्ट्रैक्चर (संकुचन) के कारण चलने-फिरने में दिक्कत। मानसिक पहलुओं में भी चुनौतियाँ होती हैं, जिन में आम हैं सदमे के कारण पीटीएसडी, डिप्रेशन और लोगों से मिलने-जुलने संबंधी चिंता और तनाव। वास्तव में, पूरी तरह ठीक होने के लिए लगातार भावनात्मक और समुदाय-आधारित सहारा आवश्यक है।
एसिड अटैक होने के बाद लोगों की मुख्य चुनौतियाँ क्या होती हैं, और उनके लिए आपकी क्या सलाह है? ऐसी स्थितियों के लिए स्वास्थ्य देखभाल संबंधी क्या चुनौतियाँ हैं? कृपया ऐसे लोगों की खास जरूरतों को समझने में मदद करें।
मुख्य चुनौतियाँ हैं – समाज में स्वीकार न होना और कलंकित माना जाना, आर्थिक असुरक्षा और दिक्कतें, और उचित चिकित्सा देखभाल प्राप्त न कर पाना। ऐसे लोगों के लिए मेरी सलाह है — खुद को कभी किस्मत का शिकार और पीड़ित विक्टिम न समझें। आप एक योद्धा हैं, एक जूझने वाले, एक विजेता, एक सर्वाइवर। मदद लें, उन लोगों से जुड़ें जो ऐसे ही अनुभव से गुजर चुके हैं, और यह विश्वास बनाए रखें कि आपके जलने के निशान आपकी हिम्मत की कहानी बयान करते हैं।
ऐसी कौन सी जटिलताएं हैं जिन्हें लोग समझते नहीं हैं या जिनके बारे में वे बात नहीं करते हैं?
एसिड अटैक के बाद व्यक्ति को किस तरह की विशिष्ट पुनर्निर्माण सर्जरी और मनोवैज्ञानिक सहायता की जरूरत है, इस के बारे में स्वास्थ्य प्रोफेशनल कि समझ अभी भी बहुत सीमित है। हमें जरूरत है इस के लिए खास बनाए गए डेडिकेटेड बर्न यूनिट्स जो सिर्फ इस क्षेत्र में उपचार और सहायता देने के लिए समर्पित हैं, इस क्षेत्र में प्रशिक्षित काउंसलर और ऐसे पुनर्वास प्रोग्राम जो ऐसे व्यक्तिओं की स्थिति के अनुरूप हों। अक्सर ऐसे में लोगों को अनेक प्रकार के विशेषज्ञों (मेडिकल स्पेशलिटीज़) की जरूरत होती है - प्लास्टिक सर्जरी, डर्मेटोलॉजी, ऑप्थल्मोलॉजी और साइकेट्री - पर क्योंकि उन्हें उनकी स्थिति के अनुकूल समन्वित देखभाल का प्रबंधन उपलब्ध नहीं है, लोग इन सब विशेषज्ञताओं के बीच इधर-उधर चक्कर मारते रहते हैं। वे अलग-अलग राय में तालमेल बिठाने या अधूरे उपचार को पहचान पाने में दिक्कत के कारण इस सब के बीच की दरारों में फँस जाते हैं।

ऐसे तेजाब के हमले से भावनात्मक रूप से निपटना कितना मुश्किल है?
यह बहुत ही मुश्किल है। कई दिन गुस्से में, स्थिति को अनदेखा करने में, और डर और गहरी उदासी में बीत जाते हैं। लोग मानो अपनी पहचान खो देते हैं। लेकिन समय के साथ, सहायता मिलने से, जीवन में फिर से मकसद का एहसास होने से, आप फिर से उभर सकते हैं। मैंने अतिजीवन शुरू करा, और इस के ज़रिए मैंने अपने दर्द को एक सार्थक उद्देश्य में बदला — और इसी से अब मुझे हर दिन जीना में मतलब का एहसास होता है और हौसला मिलता है।
लोग अक्सर सोचते हैं कि सर्जरी के बाद ठीक होने की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। लेकिन घटना के बाद लोग ज़िंदगी भर अनेक दिक्कतों से जूझते हैं — सूखी आँखें, साँस लेने में दिक्कत, गर्मी के प्रति अतिसंवेदनशीलता, दाँतों में दिक्कतें, और जलने के निशान के टिशू में कसाव से होने वाला दर्द।
भावनात्मक तौर से हर दिन आईने का सामना करना भी एक संघर्ष है। ऐसे लोगों के प्रति सिर्फ हमदर्दी जताना काफी नहीं है। समाज को उन को वास्तव में खुले दिल से सामाजिक गतिविधियों में शामिल करना चाहिए, और पूरी तरह अपनाना चाहिए।
परिवार और दोस्तों का सपोर्ट कितना ज़रूरी है?
यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब सब कुछ टूटा हुआ लगता है, तो परिवार और दोस्त भावनात्मक स्थिरता और आशा की भावना प्रदान कर सकते हैं। उनका खुल कर स्वीकारना एक ऐसी नींव है जिस पर व्यक्ति अपना आत्म-विश्वास फिर से बना पाते हैं।
कृपया हमें अपने पुरस्कारों और सम्मानों के बारे में बताएं। क्या इससे आपको अपने काम में मदद मिली है?
इन सालों में, मुझे कई अवॉर्ड्स से सम्मानित किया गया है, जिसमें भारत के राष्ट्रपति, भारत सरकार, पंजाब सरकार, कर्नाटक महिला पुरस्कार और अलग-अलग हेल्थ और सोशल इम्पैक्ट फोरम द्वारा पहचाना जाना और सम्मान मिलना शामिल हैं। ऐसे सम्मान प्राप्त करने से हमें अपने अभियानों को अधिक ख्याति मिलती है और ये हमारे मकसद को बढ़ाते हैं, पार्टनरशिप बनाने में मदद करते हैं, और जूझने वालों की दिक्कतें समाज के सामने अधिक प्रमुखता से आती हैं। लेकिन मेरा असली इनाम है हमले के बावजूद लोगों को फिर से आत्म-विश्वास से मुस्कुराते हुए देखना।

तेजाब फेंककर हिंसक हमले के केस को “दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016” में शामिल किया गया है – क्या लोग यह बात जानते हैं? इस का एसिड अटैक से जूझ रहे लोगों की ज़िंदगी पर क्या असर हुआ है?
हाँ, तेजाब फेंककर हिंसक हमले से जूझ रहे लोगों को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (राइट्स ऑफ़ पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज़ (आरपीडबल्यूडी) एक्ट, 2016) में शामिल किया गया है, और इस शामिल किए जाने से कुछ सकारात्मक बदलाव आए हैं। इस के कारण ऐसे लोगों की चुनौतियों को ज़्यादा पहचाना गया है — कुछ कंपनियों ने उन्हें काम पर रखने में दिलचस्पी दिखानी शुरू कर दी है, और संस्थाएं अब ऐसे हमलों के कारण हुई चोटों को डिसेबिलिटी का एक रूप मानती हैं।
पर इस अधिनियम को लागू करने में अभी भी काफी कमियां हैं। अब भी हमलों से जूझ रहे कई लोगों को डिसेबिलिटी सर्टिफिकेट पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता हैं, क्योंकि चेहरे की विरूपता को अक्सर पूरी तरह से डिसेबिलिटी के तौर पर नहीं पहचाना जाता है — यहाँ तक कि चिकित्सा जगत के कुछ हिस्सों में भी।
कानूनी ढांचे का उपलब्ध होना प्रगति का संकेत है, पर अब भी बहुत कुछ करना है। हमें यह सुनिश्चित करना है एसिड अटैक के असर से जूझ रहने लोगों के प्रति समाज में अधिक जागरूकता और संवेदनशीलता हो, और इन लोगों को ज़िंदगी के हर पहलू में अन्य लोगों के बराबर अवसर और विकल्प मिलें, उन्हें उचित सहायता मिले, और वे आत्मा-सम्मान से अपनी जिंदगी जी सकें।

अतिजीवन के अगले कदम क्या हैं?
अब हमारा ध्यान तेजाब हमलों की रोकथाम, इस से संबंधित उचित नीति बनाने के लिए अभियान, और चिरस्थायी रूप से चल सकने वाले व्यावहारिक पुनर्वास पर केंद्रित है।
हम पीवीआर आईनॉक्स के साथ मिलकर नेशनल बर्न प्रिवेंशन और फर्स्ट एड कैंपेन पर काम कर रहे हैं, ताकि लोगों को फर्स्ट एड, रोकथाम और रिहैबिलिटेशन के बारे में जानकारी दी जा सके।
हम चाहते हैं कि हमारा प्रोग्राम हर राज्य में फैले ताकि कोई भी हमले से जूझ रहे व्यक्ति हमारे अभियानों से वंचित न हों और ऐसिड अटैक कि रोकथाम देश की एक प्राथमिकता बने।
हम साल के एक दिन को “नेशनल बर्न अवेयरनेस डे” के रूप में घोषित करने की भी वकालत कर रहे हैं।
उम्मीद है कि एक दिन देश एसिड अटैक और जलने की घटनाओं से जूझ रहे लोगों को इस रूप में पहचानेगा और अपनाएगा कि वे असल में क्या हैं, न कि इस आधार पर कि वे कैसे दिखते हैं।
As told to Moyna Sen
