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Submitted by PatientsEngage on 28 August 2025
Profile pics of Dr. Subhadra Jalali, Opthalmologist and Dr. Tejo Pratap Oleti, Neonatology head

इस लेख में पढ़ें डॉ. सुभद्रा जलाली (एलवी प्रसाद आई इंस्टीट्यूट में नेत्र रोग विशेषज्ञ सलाहकार) और डॉ. तेजो प्रताप ओलेटी (फर्नांडीज अस्पताल में नियोनेटोलॉजी यूनिट के प्रमुख) की पेशेंट्स एंगेज से नवजात शिशुओं में समय से पहले अंधेपन के मुद्दे पर चर्चा, खास तौर पर रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी के कारण हुए अंधेपन पर। "30 दिन रोशनी के" नामक अभियान इसी अंधेपन को रोकने के सिलसिले में शुरू किया गया है।

17 नवंबर को हर साल विश्व प्रीमैच्योरिटी दिवस के रूप में मनाया जाता है ताकि समय से पहले जन्म से जुड़े मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके और बच्चों में समय से पहले जन्म लेने के कारण होने वाली समस्याओं को संबोधित किया जा सके। भारत में हर साल लगभग 30 लाख बच्चे समय से पहले पैदा होते हैं (इन्हें प्रीमैच्योर या प्रीटर्म बच्चे भी कहते हैं) । भारत में दुनिया में सबसे ज़्यादा अंधे बच्चे हैं, जिनके अंधेपन के सबसे आम कारण हैं रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी, जन्मजात मोतियाबिंद, जन्मजात ग्लूकोमा और सेरेब्रल (प्रमस्तिष्क) संबंधी दृष्टि हानि हैं। डॉ. सुभद्रा जलाली (एल वी प्रसाद आई इंस्टीट्यूट में नेत्र रोग विशेषज्ञ सलाहकार) और डॉ. तेजो प्रताप ओलेटी (फर्नांडीज अस्पताल में नियोनेटोलॉजी यूनिट के प्रमुख) के साथ हुई वेबिनार चर्चा पर आधारित यह लेख हमें समय से पहले जन्मे बच्चों में रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी (आरओपी) के बारे में समझने में मदद करता है। सभी समय से पहले जन्मे बच्चों में आरओपी की समय पर जांच, उसका आरंभ में ही पता लगाना और उपचार करना ऐसे बच्चों में अंधेपन को रोकने में महत्वपूर्ण है।

आरओपी और समय से पहले अंधापन क्या है?

आरओपी, यानि कि रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी अंधापन का एक ऐसा प्रकार है जो विशेष रूप से समय से पहले जन्मे बच्चों में होता है और ज्यादातर उन बच्चों में होता है जिन्हें अस्पताल प्रणालियों के माध्यम से बचाया जाता है। आरओपी को पहले रेट्रोलेंटल फाइब्रोप्लासिया के रूप में जाना जाता था। प्रीटर्म या समय से पहले जन्मे बच्चे ऐसे बच्चे हैं जो 37 सप्ताह से पहले पैदा होते हैं और जिनका वजन 2 किलोग्राम से कम होता है  (प्रीटर्म के मापदंड विभिन्न देशों में अलग-अलग होते हैं). ऐसे बच्चों में समय से पहले अंधेपन होने का अधिक जोखिम होता है क्योंकि उनका रेटिना पूरी तरह से विकसित नहीं होता है। आम तौर पर, रेटिना के पूरी तरह से विकसित होने के लिए गर्भ की अवधि 40 सप्ताह होनी चाहिए ।

आरओपी को कैसे रोकें?

समय से पहले जन्म की रोकथाम से आरओपी के होने को रोका जा सकता है। इसलिए समय से पहले जन्म या पूरी तरह विकसित होने से पहले के जन्म में योगदान देने वाले कारकों को कम करना आरओपी की रोकथाम के लिए बहुत जरूरी है।

  • प्रसवपूर्व देखभाल और प्रसवोत्तर देखभाल की गुणवत्ता पर ध्यान देना
  • गर्भधारण से पहले पहले महिला को काउनसेलिंग देना
  • गर्भावस्था के दौरान माँ को, स्थिति के अनुसार, उचित स्वास्थ्य प्रणाली द्वारा प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक स्तर के स्वास्थ्य देखभाल केंद्र में समर्थन देना
  • समय से पहले जन्म की स्थिति हो तो, आवश्यकता अनुसार माँ को प्रसवपूर्व कॉर्टिकोस्टेरॉइड देना, और माँ के गर्भाशय ग्रीवा की लंबाई की जांच
  • कमज़ोर या अधिक जोखिम वाले नवजात शिशुओं की समय पर जांच और देखभाल पर ध्यान देना। यानी, ऐसी स्थितियाँ जैसे कि असिस्टिड फर्टिलिज़ेशन (सहायक निषेचन), आईवीएफ से पैदा शिशुओं, सरोगेसी वाले शिशुओं या कम वजन वाले शिशुओं के लिए जांच सुनिश्चित करना
  • गर्भावस्था के दौरान क्रानिक बीमारियों की समय पर पहचान और उन का उचित प्रबंधन - जैसे गर्भकालीन मधुमेह, गर्भावस्था प्रेरित उच्च रक्तचाप आदि
  • किशोरावस्था में गर्भवती होने से बचें, खासकर कई बार गर्भवती होने से
  • गर्भावस्था के दौरान एनीमिया (रक्ताल्पता) से बचना और उचित मातृ पोषण सुनिश्चित करना।
  • गर्भावस्था के दौरान शराब, धूम्रपान और नशीली दवाओं का सेवन न करना

आरओपी को रोकने के लिए जन्म के तुरंत बाद उठाए जाने वाले कदम

  • शिशु के प्रारंभिक स्थिरीकरण के लिए गर्भनाल की क्लैंम्पिंग (गर्भनाल को बांधना और काटना) देर से करना
  • यदि फेफड़ों का पूरा विकास नहीं हुआ है, तो ऐसे मामले में सी-पीएपी या गैर-इनवेसिव वेंटिलेशन तकनीकों के माध्यम से नवजात शिशु को सांस लेने में सहायता प्रदान करना
  • यदि आवश्यक हो तो ब्लेंडर के माध्यम से ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए सहायता प्रदान करना।
  • आरओपी होने का एक मुख्य कारण है बच्चे के रक्त में ऑक्सीजन पर्याप्त मात्रा में न होना। इसलिए ऑक्सीजन का प्रबंधन आरओपी से बचने का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है।
  • नवजात शिशु में ऑक्सीजन संतृप्ति 91% से 95% के बीच होनी चाहिए।
  • शिशु का विकास ठीक हो, इस के लिए माँ के दूध या दात्री के दूध का उपयोग करना
  • नेत्र रोग विशेषज्ञ द्वारा आँखों की जाँच
  • अनावश्यक रक्त-आधान (ट्रान्स्फ्यूश़न) से बचना
  • नैदानिक देखभाल टीम और आगंतुकों द्वारा कीटाणुहीन वातावरण बनाए रखना
  • परिवार-केंद्रित दृष्टिकोण

आरओपी के लक्षण क्या हैं?

आंखों की असामान्यताओं के शुरुआती लक्षणों में शामिल हैं - आंखों का इधर-उधर चलना या ठीक से न हिलना, सफेद रंग का प्रतिबिंबित होना, और बच्चों द्वारा आंखों के पास असामान्य हाथ की हरकतें। इनमें से कोई भी शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर तुरंत आंखों की जांच करानी चाहिए।

नेत्र रोग विशेषज्ञ से कब मिलें?

आदर्श तो यह है कि जन्म के 20 से 30 दिनों के भीतर नेत्र रोग विशेषज्ञ द्वारा बच्चे की जांच करवाएं – इस में विलंब ठीक नहीं है। यदि शिशु को एनआईसीयू में भर्ती कराया गया है, तो बाल रोग विशेषज्ञ को नेत्र रोग विशेषज्ञ द्वारा शिशु की आंखों की जांच करवाने की सलाह देनी चाहिए। जीवन के बाद के चरणों में अंधेपन को रोकने के लिए सभी समय से पहले और कम वजन वाले शिशुओं की समय-समय पर आंखों की जांच करवाना आवश्यक है।

आरओपी के लिए उपचार प्रणाली क्या हैं?

आरओपी के उपचार और प्रबंधन विकल्प उस के चरण पर निर्भर करते हैं। चरण 4 आरओपी वाले बच्चों की चश्मे, आवर्धक या कम दृष्टि के लिए सहायक उपकरणों से मदद की जा सकती है, जबकि चरण 5 आरओपी के बच्चों को पुनर्वास और विशेष शिक्षा की आवश्यकता हो सकती है। अफसोस, इन कदमों के बावजूद भी कुछ बच्चों में दृष्टि हानि हो सकती है। ऐसे में ब्रेल शिक्षा सहित व्यापक सहायता और हस्तक्षेप के द्वारा बच्चों को अपने पूरे सामर्थ्य तक पहुँचने के लिए सक्षम बनाया जा सकता है। माता-पिता के लिए स्थिति को स्वीकार करना, पुनर्वास कार्यक्रमों की तलाश करना और यह समझना महत्वपूर्ण है कि कई अंधे बच्चे भी फल-फूल सकते हैं और जीवन का पूरा आनंद उठा सकते हैं।

आरओपी के दो प्रकार हैं: हल्का और गंभीर।

आक्रामक आरओपी (गंभीर आरओपी) तेजी से बढ़ता है और इस स्थिति में बच्चे को तत्काल, 24 से 48 घंटों के भीतर उपचार की आवश्यकता होती है। हल्के आरओपी के लिए अधिक जांच की आवश्यकता होती है और आरओपी की प्रगति को रोकने के लिए चिकित्सकीय हस्तक्षेप से इसका इलाज किया जा सकता है। आरओपी वाले शिशुओं पर करीबी निगरानी रखी जाती है और हर दो सप्ताह में जांच की जाती है, और लगभग 60-70% मामले चार से छह सप्ताह में ठीक हो जाते हैं। आक्रामक मामलों में आंखों में इंजेक्शन लगाए जाते हैं। इन शिशुओं में एक वर्ष तक जांच करते रहने की आवश्यकता होती है। हल्के आरओपी के मामले में लेजर उपचार दिया जाता है। कुछ दुर्लभ मामलों में आपातकालीन सर्जरी की भी आवश्यकता हो सकती है। माँ के बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए परिवार का पूरा समर्थन आवश्यक है । माता-पिता, डॉक्टरों और अस्पताल के बीच घनिष्ठ सहयोग होना बच्चे की भलाई के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। 
 

आरओपी की रोकथाम के लिए नीति निर्माताओं को क्या सुझाव हैं?

मौजूदा स्वास्थ्य कार्यक्रमों के कार्यान्वयन को मजबूत करने के लिए व्यवस्था में कुछ कमियों को दूर किया जाना चाहिए। आरबीएसके के तहत पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के साथ रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी (आरओपी) स्क्रीनिंग में सुधार की जरूरत है। वर्तमान में  आरओपी के लिए स्क्रीनिंग लगभग 30-40% केस में ही होती है, और ग्रामीण क्षेत्रों में खास तौर से कम है। सार्वजनिक-निजी भागीदारी स्थापित करना और अस्पतालों और एनआईसीयू में स्क्रीनिंग कार्यक्रमों की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है। आरओपी स्क्रीनिंग और संबंधित दिशानिर्देशों में नेत्र रोग विशेषज्ञों का नियमित प्रशिक्षण होना चाहिए। सभी चिकित्सा अधिकारियों, सीएचओ, एएनएम, एमपीएचडब्ल्यू, आशा जैसे फील्ड स्टाफ को बुनियादी आरओपी स्क्रीनिंग पर प्रशिक्षण देना चाहिए। हर स्तर पर आंखों की जांच अनिवार्य होनी चाहिए - यानी कि प्राथमिक देखभाल, माध्यमिक देखभाल या तृतीयक देखभाल स्तर पर। शिशुओं को अंधेपन से बचाने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से उचित जांच प्रणाली स्थापित करना और आंखों की देखभाल तक पहुंच में सुधार जरूरी है। हर राज्य में आरओपी स्क्रीनिंग दिशानिर्देशों के कार्यान्वयन और समावेश की जरूरत है।

  • गंभीर जटिलताओं से बचने के लिए आरबीएसके के तहत शिशु का समय पर उपचार।
  • गर्भधारण से पहले काउन्सलिंग करवाने को बढ़ावा देना।
  • उच्च गुणवत्ता की माँ की प्रसवपूर्व और प्रसवोत्तर देखभाल।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में भ्रूण शव परीक्षण और प्लेसेंटल बायोप्सी के महत्व के बारे में जागरूकता फैलाना। यह समय से पहले जन्मे शिशु की मृत्यु का कारण निर्धारित कर सकता है और माँ की अगली गर्भावस्था में संभव जोखिम से बचने में सहायक हो सकता है। स्थानीय भाषा में बैनर या विडिओ क्लिप लोगों को इस के महत्व समझने में सहायक हो सकते हैं।
  • उपचार में विलंब से बचने के लिए मामले की गंभीरता और जटिलता के आधार पर समय पर रेफरल होना चाहिए।
  • ग्रामीण इलाकों में टेलीमेडिसिन और कैमरों का उपयोग करने से अस्पताल के चक्कर कम किए जा सकते हैं।
  • सरकार द्वारा लागू किए गए मुफ्त उपचार और स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के बारे में जागरूकता फैलाना।
  • शिशु के बेहतर विकास के लिए जन्म के शीघ्र बाद ही आंखों की जांच, सुनने की जांच और हाइपोथायरायड जांच को प्रोत्साहित करना।
  •  समुदाय के प्रभावशाली लोगों, अभिनेताओं, पीआरआई और सामाजिक कार्यकर्ताओं के माध्यम से आरओपी संबंधी जानकारी फैलाने और उचित कदम लेने के लिए वकालत करना।
  • टीकाकरण की तरह एमबीबीएस छात्रों, नर्सों, एएनएम और स्कूली छात्रों के पाठ्यक्रम में आरओपी के विषय को शामिल करना।

ऐसी मान्यता है कि अगर मैं बिस्तर पर आराम करूँगी तो मेरे बच्चे का जन्म समय से पहले नहीं होगा - क्या यह सच है?

यह एक मिथक है। मातृ पोषण, एनीमिया नियंत्रण और संतुलित आहार बच्चे के सामान्य जन्म में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्वास्थ्य पर नजर रखना और समय-समय पर चेकअप करना, और गर्भधारण से पहले काउनसेलिंग करवाना बहुत महत्वपूर्ण है। ये सभी चीजें माँ और बच्चे के समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित करेंगी।

क्या आरओपी परिवारों में चलती है?

आरओपी आनुवंशिक नहीं है और यह माँ-बाप के जीन से नहीं मिलता। यह एक चिकित्सा समस्या है जिसकी रोकथाम के लिए समय पर नवजात शिशु की देखभाल की आवश्यकता होती है। आनुवंशिकी  का इसमें बहुत कम प्रभाव है।

डॉ. तेजो प्रताप ओलेटी का संदेश - "हमें बच्चे के समय से पहले जन्म होने से डरना नहीं चाहिए। समय से पहले जन्म लेना बच्चे के लिए अभिशाप नहीं है, लेकिन ऐसे में प्रसवकालीन और प्रसवोत्तर अवधि, दोनों के दौरान सर्वोत्तम देखभाल प्रदान करना महत्वपूर्ण है। माता-पिता के दृष्टिकोण से, उन का बच्चे के साथ बातचीत करते रहना और उसे प्यार से सहलाना अच्छा है और बच्चे के मस्तिष्क और रेटिना के विकास को सकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है।"

डॉ. सुभद्रा जलाली का संदेश - "मैं चाहती हूँ कि हमारे प्रधानमंत्री और मशहूर हस्तियाँ '30 दिन रोशनी के' अभियान के बारे में बात करें। मैं चाहती हूँ कि लोग 17 नवंबर – वर्ल्ड प्रीमैच्योरिटी डे - पर खुल कर बाहर आएं और इस विषय पर बुलंद आवाज में चर्चा करें।  मैं देखना चाहती हूँ कि हमारे देश में हर माता-पिता को आँखों की देखभाल के बारे में पता हो, बिल्कुल वैसे जैसे कि उन्हें पोलियो की दो बूँदों के बारे में पता है।" 

हम सब आरओपी के महत्व और जन्म के 30 दिनों के भीतर इसकी जाँच करने की जरूरत के बारे में जागरूकता फैला सकते हैं। हम सब ध्यान दें और सक्रिय रहें ताकि समय से पहले जन्मे बच्चे अंधे न हो पाएं। इस दिशा में छोटे-छोटे कदम लेने से भी छोटे बच्चों पर बड़ा प्रभाव डल सकता है।
Changed
29/Aug/2025