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Submitted by PatientsEngage on 27 July 2026
Amit, a survivor of AML with his wife and young son in an outdoor setting and the text overlay Surviving AML was my second chance at life

अमित अरविंद शेनॉय को अपने एक्यूट मायलॉयड ल्यूकेमिया (एएमएल) का तब पता चला जब एक रूट कैनाल के बाद उनका खून बहना बंद नहीं हो रहा था। इस लेख में वे अपने ल्यूकेमिया के इलाज, लंबे समय तक रहने वाले साइड इफ़ेक्ट्स और मरीज़ों के पक्ष में आवाज़ उठाने वाले (पेशेंट एडवोकेट) बनने के अपने अनुभव के बारे में बता रहे हैं।

शुरुआती लक्षण

मेरी कहानी मई 2018 की एक सुबह शुरू होती है, जब मैंने एक आड़ू खाया। मैं ‘मोहन फ़ाउंडेशन' नामक एक ऑर्गन डोनेशन गैर सरकारी संस्थान में काम करता था, और उस दिन लंबे समय तक हॉस्पिटल ऑडिट पर काम करने के बाद मैं सुबह घर लौटा था, और मुझे भूख लग रही थी।

उस दिन महज आड़ू का एक टुकड़ा काटने से मेरा सामने का दाँत दो हिस्सों में टूट गया। मैं तुरंत डेंटिस्ट के पास गया,। उन्होंने टूटे हुए दाँत की मरम्मत की और कहा कि मुझे उस दाँत के इलाज के लिए आगे चलकर रूट कैनाल करवाना पड़ेगा। इलाज शुरू हुआ और डेंटिस्ट ने दाँत में बनी कैविटी में एक टेम्पररी फ़िलिंग भर दी। मैं 2 महीने से ज़्यादा समय तक हर पंद्रह दिन में क्लिनिक जाता रहा, लेकिन खून बहना बंद ही नहीं हो रहा था। घबराए हुए डेंटिस्ट ने मुझे अपना ब्लड टेस्ट करवाने के लिए कहा।

एक्यूट मायलॉयड ल्यूकेमिया का निदान

मैंने अपना सीबीसी (सम्पूर्ण रक्त गणना, ब्लड हीमोग्राम) टेस्ट करवाया। रिजल्ट हैरान करने वाले निकले। रिजल्ट देखकर मेरा दिमाग एनालाइज़ (विश्लेषण) करने लगा और मैं इस टेस्ट से संबंधित मेडिकल जानकारी पढ़ने लगा। मुझे अंदाजा होने लगा कि क्या गड़बड़ थी। मैंने अपनी पत्नी को बताया कि मुझे लिम्फोसाइटोसिस (लिम्फोसाइट्स - एक तरह की सफ़ेद रक्त कोशिकाएं - का बढ़ना) है और मेरा हीमोग्लोबिन नॉर्मल रेंज से कम हो गया है। जब मैंने उसे ब्लड कैंसर के शक के बारे में बताया, तो वह हंसकर बोली, "क्या ज़िंदगी में तुम्हारे पास करने के लिए और कोई बेहतर काम नहीं है?"

मैं नवी मुंबई के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में हेमेटोलॉजिस्ट (खून के डॉक्टर) के पास गया। उन्होंने मुझे तीन हफ़्ते बाद दोबारा सीबीसी टेस्ट करवाने के लिए कहा। मैं ऑफिस जाता रहा और अपना काम करता रहा, लेकिन दिन के समाप्त होने तक मुझे बहुत ज़्यादा थकान महसूस होने लगी थी।

तीन हफ़्ते बाद, यानी 4 अगस्त 2018 को, मैंने फिर से अपना सीबीसी टेस्ट करवाया और उसी डॉक्टर से अपॉइंटमेंट लिया। इस बार मेरी पत्नी भी मेरे साथ थी। डॉक्टर ने हम दोनों को बिठाया और रिपोर्ट्स देखीं। उन्होंने शांति से मुझे और मेरी पत्नी को बताया कि मुझे सच में एक्यूट मायलोइड ल्यूकेमिया है और उन्हें हैरानी हो रही थी कि मैं कितना सामान्य दिख रहा था। आम तौर पर, ब्लास्ट क्राइसिस वाले मरीज़, जिनमें ब्लास्ट सेल्स (अपरिपक्व कोशिकाएं) 20% या उससे ज़्यादा होते हैं, बहुत ज़्यादा थकान की वजह से बिस्तर पर ही पड़े रहते हैं। उस समय मेरे ब्लास्ट सेल्स 23% थे, फिर भी इंडक्शन से पहले इस कंसल्टेशन के दौरान मैं डॉक्टर के सामने बैठा था। मुझे और मेरी पत्नी को बहुत बड़ा झटका लगा और हम सोचने लगे कि भला ऐसा किन वजहों से हुआ होगा, पर डॉक्टर ने कहा, "यह बस बुरी किस्मत की बात है।" उन्होंने मुझे 13 अगस्त को भर्ती होने के लिए कहा और बताया कि मैं कम से कम एक और साल तक काम नहीं कर पाऊँगा। मैं घर आया, अपने परिवार से बात की, और उन्हें और खुद को आने वाले दिनों के लिए तैयार किया।

13 अगस्त 2018 को मैं भर्ती हुआ और दोपहर करीब 3 बजे मेरे बोन मैरो (अस्थि मज्जा) का सैम्पल पहली बार बायोप्सी के लिए निकाला गया। मुझे इस प्रक्रिया से इतना डर लग रहा था कि मैंने डॉक्टर से जनरल एनेस्थीसिया देने के लिए कहा। मेरे डॉक्टर हँसे और उन्होंने मुझे एंग्जायटी कम करने वाला इंजेक्शन दिया। शाम को सैम्पल के आधार पर डॉक्टर ने बताया कि मेरे बोन मैरो में 60% कोशिकाएं अपरिपक्व थीं (ब्लास्ट सेल) और इलाज तुरंत शुरू करना मेरे लिए अच्छा होगा। इस बीमारी (ए.एम.एल) के मूल कारण का पता लगाने के लिए मेरे सैंपल को जेनेटिक और इम्यूनोलॉजिकल जांच के लिए भी भेजा गया।

एक्यूट मायलॉयड ल्यूकेमिया (AML) का इलाज

14 अगस्त को, मेरे दाहिने बांह में एक पीआईसीसी (पेरिफ़रली इंसर्टेड सेंट्रल कैथेटर) लाइन लगाई गई। इस लंबी पतली नली (कैथेटर) के जरिए कैंसर से लड़ने की दवा को सीधे दिल के पास की बड़ी रक्त वाहिकाओं में डाला जाता था ताकि रक्त द्वारा दवा पूरे शरीर में फैल सके। मुझे एक आइसोलेशन वार्ड (पृथक रखने के लिए) में रखा गया, ताकि मैं वहाँ इलाज शुरू होने के बाद कुछ दिन बिना संक्रमण के जोखिम के रह पाऊँ।

डॉक्टर ने मुझे बताया कि मैं अगले दिन अपने परिवार और दोस्तों से मिल सकता था, लेकिन उसके बाद इलाज चलने तक लंबे समय तक उनसे नहीं मिल पाऊँगा।

16 अगस्त को, डॉक्टर ने मेरी पहली कीमोथेरेपी शुरू की। मेरे लिए जो थेरपी तय की गयी थी वह 7+3 इंडक्शन थेरेपी थी जिसमें डोनोरुबिसिन और साइटाराबिन नाम की दो दवाएँ दी जानी थीं। यह थेरेपी एक हफ़्ते तक चली.

30 अगस्त को, पहली कीमोथेरेपी शुरू होने के 14 दिन बाद, मेरी दूसरी बोन मैरो बायोप्सी की गई। शाम को डॉक्टर ने आकर बताया कि उन्हें हैरानी हुई थी कि थेरेपी नाकाम रही थी और अब एक दूसरी, ज़्यादा असरदार कीमोथेरेपी आज़मानी होगी - एफएलएजी-आईडीए यानि कि फ्लुडाराबिन, साइटाराबिन (एआरए–सी), जी-सीएसएफ (ग्रैनुलोसाइट कॉलोनी-स्टिम्युलेटिंग फ़ैक्टर) और इडारुबिसिन)।

तब तक, बोन बोने मैरो की जेनेटिक और इम्यूनोलॉजिकल जाँच रिपोर्ट आ चुकी थी, जिससे पता चला कि मुझे 'सोल 9क्यू क्रोमोसोम डिलीशन' और 'इंटरमीडिएट-रिस्क एएमएल ' की समस्या थी।

डॉक्टर ने जिस दूसरी कीमोथेरेपी का सुझाव दिया था - एफएलएजी-आईडीए प्रोटोकॉल – वह आम तौर पर उन मरीज़ों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिनकी बीमारी दोबारा लौट आई है और जिन्हें ज़्यादा असरदार थेरेपी की ज़रूरत होती है।

मेरी दूसरी कीमोथेरेपी 5 सितंबर को शुरू हुई और 5 दिनों तक चली। डॉक्टरों ने मुझे पहले ही आगाह कर दिया था कि इस थेरेपी से मैं बहुत कमजोरी महसूस करूंगा, साथ ही मुझे 'न्यूट्रोपेनिया' (न्यूट्रोफिल काउंट कम होना) हो जाएगा और संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाएगा। सभी संक्रमण से बचाने के लिए मुझे भारी एंटीबायोटिक, एंटी-वायरल और असरदार एंटी-फंगल दवाएँ दी गईं। मुझे यह भी सलाह दी गई कि मैं अकेले टॉयलेट न जाऊँ और हमेशा अपनी पत्नी को साथ रखूँ। इस पूरे समय, मेरी प्यारी पत्नी 24x7 मेरे कमरे में मेरे साथ रही। मेरे इलाज के दौरान हम दोनों ने अपनी नौकरियों से छुट्टी ले रखी थी।

मेरे शरीर में बीमारी से बचाने वाली कई दवाइयाँ की भरमार होने के बावजूद, एक रात मुझे तेज़ बुखार आया और शरीर का तापमान 104.5°F तक पहुँच गया। डॉक्टर परेशान हो गए और उन्होंने मुझे आगे के इलाज के लिए आईसीयू में शिफ्ट करने का फ़ैसला किया। मेरी बांह में लगी हुई पीआईसीसी लाइन हटा दी गई और ब्लड कल्चर के बाद ज़्यादा मज़बूत एंटीबायोटिक्स देने के लिए एक दूसरी सेंट्रल लाइन लगाई गई। अगले दिन, दवाइयाँ और दूसरे ब्लड प्रोडक्ट्स तेज़ी से देने के लिए डॉक्टरों ने मेरी गर्दन में ग्रीवा शिरा (जगुलर वेन) के ज़रिए एक सेंट्रल लाइन लगाई। ब्लड कल्चर के नतीजों से पता चला कि मुझे 'सैप्रोकीट क्लवाटा' नाम का जानलेवा फंगल इन्फेक्शन था। नसों के ज़रिए एंटीफंगल थेरेपी शुरू की गई और अगले 6 हफ़्तों तक मुझे बारी-बारी से ओरल (मुँह से ली जाने वाली) एंटीफंगल थेरेपी भी दी गई। मैं एक हफ़्ते तक आईसीयू में रहा और इससे मैं और भी कमज़ोर हो गया।

दूसरी कीमोथेरेपी के 14 दिन बाद मेरी तीसरी बोन मैरो बायोप्सी की गई। यह देखने के लिए कि क्या कोई बदलाव हुआ है और थेरेपी ने काम किया है या नहीं, जेनेटिक और इम्यूनोलॉजिकल टेस्टिंग के लिए फिर से सैंपल भेजे गए। उसी शाम अच्छी ख़बर मिली। थेरेपी काम कर रही थी!

पेरिफेरल ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांट

चूंकि मैं इंटरमीडिएट-रिस्क एएमएल का मरीज़ था और मेरा कोई सगा भाई-बहन नहीं था, इसलिए डॉक्टर ने मुझे एमयूडी – पीबीएससीटी (मैच्ड अनरिलेटेड डोनर – पेरिफेरल ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांट) करवाने की सलाह दी। एचएलए मैचिंग के लिए मेरे ब्लड सैंपल लिए गए और डोनर की तलाश शुरू हुई। एक दिन बाद, डॉक्टर ने हमें बताया कि भारत की स्टेम सेल रजिस्ट्री, डीएटीआरआई में खोज करने पर मेरे एचएलए टाइप के लिए 12 पूरी तरह से मैच करने वाले डोनर मिले। डीएटीआरआई ने डोनर के साथ मिलकर 23 नवंबर 2018 को पेरिफेरल स्टेम सेल कलेक्शन की व्यवस्था की।

नतीजों की दोबारा पुष्टि के लिए 21वें दिन (30 सितंबर, 2018) एक और बोन मैरो बायोप्सी की गई। मैं रिमिशन (बीमारी के लक्षणों में कमी) की स्थिति में था। जेनेटिक और इम्यूनोलॉजिकल टेस्ट की रिपोर्ट आईं और इस से पता चला कि जेनेटिक म्यूटेशन खत्म हो चुका था और मेरा बोन मैरो कैंसर-मुक्त था। मैं पूरी तरह से साइटोजेनेटिक रिमिशन में था।

उस समय नवी मुंबई स्थित इस अस्पताल में बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) वार्ड की सुविधा नहीं थी, इसलिए मेरे डॉक्टर ने सलाह दी कि मैं उनके एक सीनियर सहयोगी की देखरेख में पुणे के अस्पताल में ट्रांसप्लांट करवाऊं। मेरी पत्नी पुणे गई और नए हेमेटो-ऑन्कोलॉजिस्ट से मिली, जिन्होंने मेरे केस का अध्ययन किया और उन्हें मुझे एलोजेनिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के लिए भर्ती करवाने को कहा। यह ऐसा ट्रांसप्लांट होता है जिस में डोनर और अंग-दान प्राप्त करने वाला व्यक्ति जेनेटिक रूप से अलग-अलग होते हैं और इसलिए इम्यूनोलॉजिकल रूप से असंगत होते हैं।

इस समय तक 45 दिन बीत चुके थे, और डॉक्टर ने सुझाव दिया कि मैं एक हफ़्ते के लिए घर जाऊं। मेरी किस्मत अच्छी थी कि मेरे पास मेडिकल इंश्योरेंस था और अस्पताल प्रबंधन से अच्छा डिस्काउंट भी मिल पाया, और पूरा भुगतान करने के बाद मैं 30 सितंबर 2018 को घर आ गया।

डॉक्टर ने मुझे स्टेम सेल ट्रांसप्लांट से पहले कीमोथेरेपी की तीसरी प्रोटेक्टिव डोज़ के लिए 7 अक्टूबर 2018 को फिर से भर्ती होने के लिए कहा। अस्पताल ने हमें ट्रांसप्लांट और उसके बाद की देखभाल के लिए 40 लाख रुपये से ज़्यादा का अनुमानित खर्च बताया। उस समय तक, हमारी लगभग सारी बचत खत्म हो चुकी थी।

मेरी पत्नी के अंकल ने सुझाव दिया कि हम फंड जुटाने के लिए क्राउडफंडिंग की कोशिश करें। मेरी पत्नी ने 10 अक्टूबर 2018 को मेरे लिए एक अभियान शुरू किया और सोशल मीडिया व लोगों से बातचीत के ज़रिए अभियान का संदेश फैलाया। हमें हैरानी हुई कि हमने सिर्फ़ 5 दिनों में 45 लाख रुपये जुटा लिए। लोगों ने निस्वार्थ भाव से दान दिया और हम इस नेक काम के लिए उनकी उदारता के आभारी हैं।

मैंने कीमोथेरेपी का तीसरा राउंड - एचआईडीएसी साइटाराबिन का एक साइकिल - 7 से 12 अक्टूबर 2018 में पूरा किया। कीमो के बाद, मुझे इन्फेक्शन हो गया, जिसकी वजह से मुझे 15 नवंबर 2018 तक अस्पताल में रहना पड़ा।

आखिरकार, मैं अगले कदम – यानी स्टेम सेल ट्रांसप्लांट – की तैयारी के लिए घर वापस आ गया।

15 दिन बिना किसी परेशानी के बीते। फिर हम पुणे चले गए। ट्रांसप्लांट के बाद आने वाले महीनों में यही मेरा घर होने वाला था।

6 दिसंबर 2018 को, मुझे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ ट्रांसप्लांट से पहले आवश्यक मेरी इस आखिरी कीमोथेरेपी की तैयारी के लिए एक नई पीआईसीसी लाइन लगाई गई।

मैं सीआईबीएमटीआर आरआईसी (रिड्यूस्ड इंटेंसिटी कंडीशनिंग) ट्रायल प्रक्रिया का हिस्सा था, जिसमें मेलफालन और फ्लुडाराबिन का इस्तेमाल किया गया था और उसके बाद पूरे शरीर का किरणन किया गया, ताकि हाई-एनर्जी रेडिएशन के इस्तेमाल से मेरे शरीर के व्हाइट ब्लड सेल्स खत्म हो सकें। मेलफालन की वजह से म्यूकोसाइटिस (मुंह के अंदर छाले) हो गया, हालांकि इन्फ्यूजन के दौरान मैं लगातार बर्फ के टुकड़े चूस रहा था। अगले दिन मुझे खून की उल्टी हुई क्योंकि एक छाला फट गया था – ऐसा मेरे साथ पहली बार हुआ था। इतनी भारी कीमोथेरेपी के बाद अंगों को नुकसान से बचाने के लिए मुझे कई तरह की दवाएं दी गईं।

13 दिसंबर 2018 को, मेरे बोन मैरो ट्रांसप्लांट के दिन, मुझे आईसीयू ले जाया गया। वहाँ हरे रंग के साफ़ कपड़े से ढकी एक ट्रे में मेरे डोनर (जिनका मैं हमेशा आभारी रहूँगा) के फ़्रीज़-थॉ किए हुए स्टेम सेल रखे थे। एक साधारण ब्लड ट्रांसफ़्यूज़न के ज़रिए मेरे शरीर में स्टेम सेल डालने की पूरी प्रक्रिया में 3 घंटे लगे।

पाँच दिन बाद, मुझे ग्रेड 3 जीवीएचडी (ग्राफ़्ट वर्सेस होस्ट डिज़ीज़) हो गया, जिसमें मुझे बहुत ज़्यादा दस्त और भूख न लगने की समस्या हुई। यह कितना गंभीर है, यह पता लगाने के लिए मेरी कोलोनोस्कोपी की गई। इस प्रक्रिया की तैयारी के लिए कोलन को साफ़ करने के लिए 2 लीटर पीईजी घोल पीना पड़ता है। कोलोनोस्कोपी सफलतापूर्वक कर ली गई और यह बहुत बड़ी राहत की बात थी।

एक दिन बाद, मुझे तेज़ बुख़ार के साथ इन्फ़ेक्शन हो गया। मुझे साँस लेने में तकलीफ़ हुई क्योंकि मेरा आक्सिजन का स्तर गिरकर 90% हो गया था। जब जाँच में पता चला कि मेरा न्यूट्रोफ़िल काउंट शून्य था तो मुझे तुरंत आईसीयू में शिफ़्ट किया गया। मैं अपनी ज़िंदगी के लिए लड़ रहा था। मेरी पत्नी को बताया गया कि न्यूट्रोफ़िल एक-दो दिन में बेहतर हो सकते हैं, लेकिन इस बीच न्यूट्रोफ़िल डोनर की तलाश शुरू कर देनी चाहिए। अगर डोनेशन के बाद भी न्यूट्रोफ़िल में सुधार नहीं होता है, तो इसका मतलब है कि शरीर ट्रांसप्लांट को पूरी तरह से रिजेक्ट कर रहा है। एक्यूट रिजेक्शन को रोकने के लिए मुझे आईवी मिथाइलप्रेडनिसोलोन देना शुरू किया गया और इस थेरेपी ने कमाल का असर दिखाया। बाद में, काइमेरिज़्म टेस्ट से पता चला कि मेरे स्टेम सेल में से 99.77% डोनर के थे और 0.23% मेरे अपने सेल थे, जिसका मतलब था कि ट्रांसप्लांट सफल रहा।

मैं अभी भी मुंह से कुछ नहीं खा पा रहा था क्योंकि मेरे मुँह में छाले थे, इसलिए मुझे आई वी द्वारा पोषण (टोटल पैरेंट्रल न्यूट्रिशन) देना शुरू किया गया। आख़िरकार, 15 दिन बाद मैं खाना शुरू कर पाया।

अस्पताल में 43 दिन बिताने के बाद, मुझे अस्पताल से डिस्चार्ज मिल पाया। दुबारा साइटोमेगालोवायरस (सीएमवी) न हो, इसके लिए मुझे 15 दिन तक एंटीवायरल आईवी ट्रीटमेंट दिया गया।

ट्रांसप्लांट के बाद सीबीसी सही रह रहा है, यह पक्का करने के लिए मैं हर तीन महीने में ब्लड टेस्ट करवाता था। ट्रांसप्लांट के कारण मेरा ब्लड ग्रुप बदल कर ब्लड टाइप बी+ होना था, और इस प्रक्रिया को स्थिर होने में 6 महीने लगे। इलाज और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट से पहले मेरा ब्लड ग्रुप ओ+ था। मेरे डोनर का ब्लड ग्रुप बी+ था और वे पूरी तरह से एचएलए मिसमैच थे; ट्रांसप्लांट के बाद उन्हीं का ब्लड ग्रुप मुझमें आ गया (इसे डोनर-रेसिपिएंट सेल काइमेरिज्म कहते हैं)।

पुणे में 8 महीने बिताने के बाद, मैंने अपने हेमेटो-ऑन्कोलॉजिस्ट को अलविदा कहा और अपने शहर, मुंबई लौट आया।

तब से अब तक 7 साल और 4 महीने का समय बिना किसी परेशानी के गुज़रा है। अब मेरा एक छोटा बच्चा है और मैं आने वाले सालों में उसके साथ खुशियों भरी यादें बनाने के लिए उत्साहित हूँ।

लंबे समय तक रहने वाले साइड इफ़ेक्ट

लंबे समय तक रहने वाले साइड इफ़ेक्ट की बात करें तो मुझे डायबिटीज़ है और एफएलएजी-आईडीए प्रोटोकॉल के बाद मुझे कीमो-इंड्यूस्ड पेरिफेरल न्यूरोपैथी हो गई। न्यूरोपैथी की वजह से मेरे पैरों के तलवों में ट्रॉफिक अल्सर हो गए, जिससे मेरा चलना-फिरना मुश्किल हो गया और उन्हें ठीक होने में काफी समय लगा। अब मैं डायबिटीज और न्यूरोपैथी के दर्द के लिए दवा ले रहा हूँ। अल्सर के इलाज के दो साल बाद, अल्सर अल्सर में संक्रमण हो गया। इन्फेक्टेड अल्सर को हटाने के लिए मेरी सर्जरी हुई। मैं ज़्यादा देर तक चल या एक जगह खड़ा नहीं हो पाता था, लेकिन जनवरी 2026 में दाहिने तलवे की छोटी सी सर्जरी के बाद मैं काफी बेहतर हूँ।

डायबिटीज़ (लंबे समय तक रहने वाला साइड इफ़ेक्ट) की वजह से घाव भरने में भी अधिक दिन लगते हैं। दर्द की दवाओं और मिथाइल सायनोकोबालामिन (विटामिन बी12) की वजह से न्यूरोपैथी काफी हद तक नियंत्रण में है। डायबिटीज़ के लिए मैंने ऊपर से डाली जाने वाली चीनी पूरी तरह छोड़ दी है। मैं दिन में सिर्फ एक फल (सेब, नाशपाती, पपीता, संतरा) खाता हूँ। चाय या कॉफ़ी में चीनी की जगह स्टीविया का इस्तेमाल करता हूँ। ज़िंदगी चलती रहती है! ज़रूरी बात है पॉज़िटिव रहना।

पेशेंट एडवोकेसी (मरीज़ों के हक में आवाज़ उठाने) की मेरी यात्रा

कैंसर ने मेरी ज़िंदगी बदल दी और मुझे इस से जीने का एक नया मकसद मिला है।

एक्यूट मायलॉयड ल्यूकेमिया से लड़ने, कीमोथेरेपी सहने, जानलेवा इन्फेक्शन का सामना करने, स्टेम सेल ट्रांसप्लांट करवाने और ग्राफ्ट-वर्सेस-होस्ट बीमारी से जूझने के साथ-साथ इलाज के लंबे समय तक रहने वाले असर को झेलने के बाद, मैं उन शारीरिक, भावनात्मक और आर्थिक चुनौतियों को समझता हूँ जिनसे मरीज़ और उनके परिवार गुज़रते हैं।

मैंने पेशेंट एडवोकेट बनने का फ़ैसला इसलिए किया क्योंकि मेरा मानना है कि अपनी कहानी साझा करने से दूसरों को सुकून, सही सलाह और प्रेरणा मिल सकती है।

अपनी एडवोकेसी के ज़रिए, मैं चाहता हूँ कि मैं ब्लड कैंसर और स्टेम सेल डोनेशन के बारे में जागरूकता बढ़ाऊँ, साथ ही मरीज़ों को सही फ़ैसले लेने में मदद करूँ और उन्हें यह याद दिलाऊँ कि सबसे मुश्किल समय में भी उम्मीद कभी खत्म नहीं होती है।

एएमएल से उबरने से मुझे मानो ज़िंदगी जीने का दूसरा मौका मिला है। अपनी पेशेंट एडवोकेसी द्वारा मैं जीने के इस दूसरे मौके का सम्मान करना चाहता हूँ – यह काम दूसरों को उनकी यात्रा में हिम्मत जुटाने में मदद करने का मेरा तरीका है।

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08/Aug/2026
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