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Submitted by PatientsEngage on 16 April 2026
Stock pic of diabetes monitoring tests and text overlay on blue strip Which Diabetes Tests are Really needed?

हम हर दूसरे दिन सुनते रहते हैं कि डायबिटीज़ (मधुमेह) के लिए यह टेस्ट अच्छा है, वह टेस्ट अच्छा है। कुछ डायबिटीज़ के निदान के लिए, कुछ उसके नियंत्रण के लिए। संभव टेस्ट की यह भरमार कभी-कभी बहुत उलझन में डाल देती है – क्या करें, क्या न करें। इस लेख में डॉ. शीतल पटेल इन सब टेस्ट का परिचय देती हैं ताकि हम जान सकें कि ये कब उपयोगी हो सकते हैं।

अगर आपको डायबिटीज़ (मधुमेह) है, तो आप बहुत सारे ब्लड टेस्ट, चेक-अप और स्क्रीनिंग करवा चुके होंगे। कौन सा टेस्ट क्या है, कब करवाना चाहिए, और स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए किस की जरूरत है, यह सब समझना और याद रखना बहुत मुश्किल लगता है। ऊपर से, आप अक्सर देखते होंगे कि अलग-अलग लैब के टेस्ट पैकेज में नए टेस्ट जुड़ते रहते हैं, या आप अखबारों में किसी नए टेस्ट का ज़िक्र देखते होंगे और आप समझ नहीं पाते होंगे कि क्या आपको उनकी ज़रूरत है। इस लेख में हम विभिन्न टेस्ट का परिचय देते हैं और इन्हें तीन श्रेणियों में बांटते हैं – वे टेस्ट जिन्हें नियमित ढंग से करवाना ज़रूरी हैं, वे टेस्ट जो उपयोगी तो हैं पर जिनकी जरूरत कभी-कभी ही होती है, और वे टेस्ट जिनका जिक्र आप रिसर्च के संदर्भ में सुनते होंगे पर जो सामान्यतः शायद ही करवाए जाएंगे।

सबसे ज़रूरी टेस्ट जो आपको अवश्य करवाने चाहिए

ये वे टेस्ट हैं जिनकी सलाह विश्व भर के डायबिटीज़ एक्सपर्ट देते हैं। ये डायबिटीज़ के निदान करने, व्यक्ति के ब्लड शुगर (रक्त शर्करा) पर निगरानी रखने और डाइअबीटीज़ के कारण होने वाली कॉम्प्लिकेशन की समय पर पहचान करने के लिए आवश्यक हैं। आपको ये अवश्य नियमित रूप से करवाने चाहिए।

1. फ़ास्टिंग ब्लड ग्लूकोज़ (खाली पेट पर नापी गयी ब्लड शुगर)

  • यह क्या मापता है: यह 8–12 घंटे तक कुछ भी न खाने के बाद आपके ब्लड शुगर का स्तर मापता है।
  • यह क्यों ज़रूरी है: इसका इस्तेमाल डायबिटीज़ या प्री-डायबिटीज़ (डायबिटीज़ से पहले का चरण) का निदान करने के लिए होता है।

2. ओरल ग्लूकोज़ टॉलरेंस टेस्ट (ओजीटीटी)

  • यह क्या मापता है: यह खाली पेट पर 75एमजी ग्लूकोज़ का घोल पीने के बाद शरीर की प्रतिक्रिया मापता है। इसमें ब्लड शुगर के स्तर को घोल पीने से पहले मापा जाता है, और फिर घोल पीने के 2 घंटे बाद तक कई बार मापा जाता है।
  • यह क्यों ज़रूरी है: इस टेस्ट में देखा जाता है कि एक विशिष्ट ग्लूकोज़ मात्रा के सेवन के बाद शरीर की क्या प्रतिक्रिया है। अन्य ब्लड शुगर मापने के तरीकों में कितना और किस प्रकार का भोजन लिया गया है, इस पर कोई नियंत्रण नहीं होता है, पर इस टेस्ट में शरीर की शर्करा-संबंधी कार्यक्षमता की अधिक स्पष्ट जानकारी मिलती है। इसलिए यह व्यक्ति की स्थिति के बारे में फ़ास्टिंग ग्लूकोज़ या एचबीए1सी से फ़र्क प्रकार की उपयोगी जानकारी देता है। इसका इस्तेमाल प्री-डायबिटीज़, टाइप 2 और जेस्टेशनल डायबिटीज़ (गर्भावस्था के दौरान होने वाली डायबिटीज़, गर्भकालीन मधुमेह) का पता लगाने के लिए किया जाता है।
  • टेस्ट कितनी बार करना चाहिए: अगर आपको डायबिटीज़ होने का जोखिम है, तो हर 3 साल में। अगर आपको प्री-डायबिटीज़ है (जिस के कारण डायबिटीज़ होने का खतरा काफी बढ़ जाता है), तो हर साल। गर्भावस्था में गर्भ के 24 - 28 हफ़्ते के बीच।

3. एचबीए1सी (हीमोग्लोबिन ए1सी)

  • यह क्या मापता है: यह पिछले 2–3 महीनों में आपके औसत ब्लड शुगर का स्तर दिखाता है।
  • यह क्यों ज़रूरी है: यह आपको और आपके डॉक्टर को यह देखने में मदद करता है कि जीवनशैली और दवा से आपकी डायबिटीज़ कितनी अच्छी तरह से नियंत्रित है।
  • टेस्ट कितनी बार करना चाहिए: हर 3 से 6 महीने में।

4. सेल्फ़-मॉनिटरिंग या कंटीन्यूअस ग्लूकोज़ मॉनिटरिंग (सीजीएम)

  • यह क्या मापता है: यह पूरे दिन आपके बदलते हुए ब्लड शुगर के स्तर को दिखाता है।
  • यह क्यों जरूरी है: यह आपको यह समझने में मदद करता है कि भोजन, व्यायाम, तनाव, नींद और दवाएं आपके रक्त शर्करा (ब्लड शुगर) के स्तर को दिन भर कैसे प्रभावित करती रहती हैं। डायबिटीज़ नियंत्रण का एक महत्वपूर्ण अंग यह है कि आप अपनी ब्लड शुगर को स्वीकृत सीमाओं के बीच रखें - और इस टेस्ट से पता चलता है कि आपका ब्लड शुगर सीमा के अंदर कितनी देर रहता है (टाइम इन रेंज)।
  • इसकी किसे आवश्यकता है: ऐसे व्यक्ति जिन्हें अपने ब्लड शुगर के पैटर्न और उतार-चढ़ाव को बेहतर ढंग से समझने की आवश्यकता है, ऐसे व्यक्ति जिनका ब्लड शुगर नियंत्रित रहता है, और विशेष रूप से ऐसे लोग जो इंसुलिन लेते हैं – इन सब के लिए यह टेस्ट महत्वपूर्ण है। टाइप I डायबिटीज़ और गर्भकालीन मधुमेह वालों के लिए यह खास तौर पर उपयोगी है। टाइप 2 डायबिटीज़ वालों में भी इसका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, खासकर यदि यह समझना हो कि ब्लड शुगर का स्तर बहुत ऊपर (हाइपर) या बहुत नीचे (हाइपो) किन कारणों से जा रहा है।

सीजीएम का उपयोग कैसे करें, इस बारे में अधिक पढ़ें: https://www.patientsengage.com/conditions/should-i-use-continuous-gluco…

5. गुर्दों (किडनी) की कार्यक्षमता के आकलन के लिए परीक्षण (रीनल फ़ंक्शन टेस्ट)

  • ये क्या मापते हैं: डायबिटिक नेफ्रोपैथी डायबिटीज़ की एक आम समस्या है, और इस टेस्ट में ऐसे कई चीजें मापी जाती हैं जिन से यदि गुर्दों में समस्या हो रही है, तो यह शुरू में ही पहचाना जा सकता है। जल्दी पकड़ने से उचित कदम ले कर गुर्दे में हो रहे नुकसान से बचा जा सकता है, या इसे सीमित किया जा सकता है। नियमित टेस्ट करवाने से गुर्दे की बीमारी की प्रगति पर नजर रखी जा सकती है और उपचार की प्रभावशीलता भी देखी जा सकती है।
  • इस टेस्ट में शामिल हैं:
    •   यूरिन एल्ब्यूमिन-टू-क्रिएटिनिन रेशिओ (यूएसीआर): यह परीक्षण आपके मूत्र में एल्ब्यूमिन (एक प्रकार का प्रोटीन) और क्रिएटिनिन (एक अपशिष्ट पदार्थ) की मात्रा को मापता है। स्वस्थ गुर्दे एल्ब्यूमिन को रक्त में बनाए रखते हैं – यदि मूत्र में एल्ब्यूमिन पाया जाए तो यह गुर्दे की क्षति का संकेत है।
    •   सीरम क्रिएटिनिन: क्रिएटिनिन मांसपेशियों के चयापचय से उत्पन्न एक अपशिष्ट पदार्थ है।
    •   ईजीएफआर: यह ब्लड टेस्ट यह अनुमान लगाता है कि आपके गुर्दे आपके रक्त से अपशिष्ट पदार्थों को कितनी अच्छी तरह से, किस दर से निकाल रहे हैं। इसे ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट कहा जाता है। कम दर का मतलब है कि गुर्दे ठीक से काम नहीं कर रहे हैं।
  • टेस्ट कितनी बार करना चाहिए: टाइप 1 डायबिटीज़ वाले लोगों के लिए, निदान के 5 साल बाद से वार्षिक परीक्षण शुरू होना चाहिए। टाइप 2 डायबिटीज़ वाले लोगों के लिए, निदान के समय से ही वार्षिक परीक्षण शुरू होना चाहिए।

6. नेत्र परीक्षण

  • यह क्या मापता है: डायबिटीज़ के कारण नेत्रों में होने वाली समस्याओं (जैसे कि डायबिटिक रेटिनोपैथी, डायबिटिक मैकुला एडिमा और ग्लूकोमा) के लिए नेत्रों की पुतलियों को दवा से डाईलेट करके निरीक्षण करना आवश्यक है। इस में आंखों के रेटिना, ऑप्टिक तंत्रिका और रक्त वाहिकाओं की जांच की जाती है ताकि समस्या की शुरुआती अवस्था में ही पहचान हो पाए।
  • यह क्यों जरूरी है: डायबिटीज़ से दृष्टि हानि हो सकती है। नेत्र परीक्षण से समस्या जल्दी पकड़ी जा सकती है और हानि बढ़ने को रोकने के लिए कदम लिए जा सकते हैं।
  • टेस्ट कितनी बार करना चाहिए: निदान के बाद हर साल जांच करानी चाहिए। गर्भकालीन मधुमेह वाली महिलाओं को गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में और फिर प्रसव के एक वर्ष बाद फिर से जांच करानी चाहिए।

7. पैरों का निरीक्षण

  • यह क्या है: यह पैरों की जांच से पैर की तंत्रिकाओं (नर्व) के नुकसान (परिधीय तांत्रिक में समस्या, पेरिफेरल न्यूरोपैथी) या रक्त परिसंचरण में समस्या पर जानकारी देता है। इस से पैरों में डायबिटीज़ संबंधी जटिलताओं के विकसित होने के जोखिम को कम, मध्यम या उच्च जोखिम वाली श्रेणी में विभाजित करने में मदद होती है।
  • जाँच में ये शामिल होने चाहिए:
    • (विजुअल इन्स्पेक्शन): पैरों की त्वचा से जुड़ी समस्याओं के बारे में व्यक्ति से पूछना/ पैरों की जांच करना - जैसे सूखापन, नाखूनों की सेहत, कड़ेपन (कैलसीज) और संक्रमण (फंगल इन्फेक्शन)।
    •   न्यूरोलॉजिकल जाँच: नसों के नुकसान की जाँच के लिए माइक्रोफिलामेंट का इस्तेमाल करना।
    •   मस्कुलोस्केलेटल जाँच: किसी भी तरह की संरचात्मक त्रुटि (जैसे मुड़ी हुई या एक-दूसरे पर चढ़ी हुई उंगलियाँ, गोखरू (बनियन) आदि की जाँच करना।
    •   वैस्कुलर जाँच: पैरों में रक्त प्रवाह का आकलन करना। पैरों की नब्ज़ तो चेक करना और दोनों टखनों के ब्लड प्रेशर की माप की तुलना करना। यदि पैरों में कुछ भाग पीले या लाल हैं या बाल कम उग रहे हैं तो यह रक्त परिसंचरण में समस्या का संकेत हो सकता है।
    •   रिफ्लेक्स (प्रतिवर्त प्रक्रिया) जाँच: एक छोटे हथौड़े का इस्तेमाल करके जाँच करना।
  • यह क्यों ज़रूरी है: इस से प्राप्त जानकारी से समय पर कदम लिए जा सकते हैं और पैरों की गंभीर समस्याओं, जैसे अल्सर, गैंग्रीन या यहाँ तक कि पैर कटने (अंगविच्छेद) से भी बचा जा सकता है।
  • टेस्ट कितनी बार करना चाहिए: साल में कम से कम एक बार।

8. कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर की जाँच

  • ये क्यों ज़रूरी हैं: डायबिटीज़ में बुरे (एलडीएल) कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स के बढ़ने और अच्छे (एचडीएल) कोलेस्ट्रॉल के कम होने का खतरा होता है, जिस से हृदय की बीमारी का खतरा बढ़ता है। इसलिए हार्ट अटैक, स्ट्रोक और इस तरह की अन्य जटिलताओं से बचने के लिए ये नियमित जाँच बहुत ज़रूरी हैं।
  • टेस्ट कितनी बार करना चाहिए: हर बार डॉक्टर के पास जाने पर, या कम से कम साल में एक बार।

डायबिटीज़ के प्रबंधन के शेड्यूल के बारे में इस लेख में अधिक पढ़ें: https://www.patientsengage.com/conditions/diabetes-maintenance-schedule

9. विटामिन बी12 और डी3 के स्तर की जाँच

  • ये क्यों ज़रूरी हैं: जो लोग मेटफ़ॉर्मिन (डायबिटीज़ की एक आम दवा) ले रहे हैं, उनमें इन विटामिनों की कमी होने का खतरा अधिक होता है। विटामिन बी12 तंत्रिकाओं की सेहत के लिए बहुत ज़रूरी है और इसकी कमी से पेरिफेरल न्यूरोपैथी हो सकती है। विटामिन डी3 हड्डियों की सेहत के लिए आवश्यक है, और इसका स्तर कम होने पर इंसुलिन रेजिस्टेंस और पैरों में अल्सर (घाव) होने का खतरा बढ़ सकता है।
  • टेस्ट कितनी बार करना चाहिए: अगर आप मेटफ़ॉर्मिन ले रहे हैं, तो साल में कम से कम एक बार।

डायबिटीज़ के प्रबंधन के शेड्यूल के बारे में इस लेख में अधिक पढ़ें: https://www.patientsengage.com/conditions/diabetes-maintenance-schedule

कुछ लोगों के लिए/ कुछ हालात में ज़रूरी टेस्ट

ये टेस्ट हर किसी के लिए ज़रूरी नहीं होते हैं, लेकिन कुछ खास स्थितियों में डॉक्टर इन्हें करवाने की सलाह दे सकते हैं और ये मददगार हो सकते हैं।

1. सी-पेप्टाइड

  • इसका इस्तेमाल कब होता है: डायबिटीज़ के निदान के समय, अगर आपके डॉक्टर को यह पक्का न हो कि आपकी डायबिटीज़ टाइप 1 प्रकार की है या टाइप 2 प्रकार की।
  • यह क्या बताता है: यह दिखाता है कि आपका शरीर कितना इंसुलिन बना रहा है।

2. ऑटोएंटीबॉडी के लिए टेस्ट

  • इनका इस्तेमाल कब होता है: इस टेस्ट का इस्तेमाल इस बात की पुष्टि करने के लिए होता है कि क्या व्यक्ति को टाइप 1 डायबिटीज़ है या धीरे-धीरे बढ़ने वाली एलएडीए (लैटन्ट ऑटोइम्यून डायबिटीज़ इन ऐडल्ट्स, वयस्कों में ऑटोइम्यून डायबिटीज़) है। एलएडीए को अक्सर '1.5 डायबिटीज़' भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें टाइप 1 और टाइप 2, दोनों तरह की डायबिटीज़ के लक्षण पाए जाते हैं। सही इलाज के लिए व्यक्ति को किस प्रकार का डायबिटीज़ है, यह पता चलाना बहुत ज़रूरी है।
  • यह क्या बताता है: टाइप 1 डायबिटीज़ में बीटा कोशिकाओं की ऑटोइम्यूनिटी की जाँच करने के लिए 4 मार्कर देखे जाते हैं: आइलेट सेल एंटीबॉडीज़ (आईसीए), ग्लूटामिक एसिड डेकार्बोक्सिलेज (जीएडी-65) के प्रति एंटीबॉडीज़, इंसुलिन ऑटोएंटीबॉडीज़ (आईएए), और आईए-2ए। यह टेस्ट इन को मापता है।

3. फ्रुक्टोसामाइन या ग्लाइकेटेड एल्ब्यूमिन

  • इसका इस्तेमाल कब होता है: ऐसी स्थितियों में जब एचबीए1सी के टेस्ट के रिजल्ट गलत हो सकते हैं (उदाहरण के तौर पर, गर्भावस्था के दौरान या अगर आपको एनीमिया या खून से जुड़ी कोई बीमारी है)।

4. सीरम इंसुलिन टेस्ट

  • यह क्या मापता है: यह पैंक्रियास (अग्न्याशय) द्वारा इंसुलिन के उत्पादन को मापता है और बताता है कि शरीर इस इंसुलिन का कितने कारगर तरीके से इस्तेमाल करता है।
  • इसका इस्तेमाल कब होता है: यह पता चलाने के लिए कि क्या डायबिटीज़ टाइप 1 प्रकार की है या टाइप 2 प्रकार की, और इंसुलिन रेजिस्टेंस कितनी है। यह हाइपोग्लाइसीमिया (बहुत कम ब्लड शुगर) के कारण की जाँच करने के लिए और इंसुलिन बनाने वाले दुर्लभ ट्यूमर (जैसे इंसुलिनोमा) का पता लगाने में मदद करता है।

5. लिवर फंक्शन टेस्ट

  • ऊपर बताए गए टेस्ट के अलावा, डायबिटीज़ से पीड़ित लोगों के लिए लिवर फंक्शन टेस्ट भी नियमित रूप से किया जाता है। टाइप 2 डायबिटीज़ वाले 70% तक लोगों में MASLD (मेटाबोलिक डिस्फंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोसिस लिवर डिजीज, जिसे पहले नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज या NAFLD के नाम से जाना जाता था) के कारण लिवर एंजाइम का स्तर अधिक हो सकता है। नियमित निगरानी से लिवर की किसी भी समस्या का जल्दी पता लगाने में मदद मिलती है, क्योंकि जब तक बीमारी गंभीर स्थिति (एडवांस स्टेज) में नहीं पहुँच जाती, तब तक अक्सर इसके लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। इसके अलावा, मेटफॉर्मिन जैसी डायबिटीज़ की कई दवाएं लिवर के माध्यम से प्रोसेस होती हैं, इसलिए लिवर फंक्शन टेस्ट कराने से यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि डॉक्टर द्वारा दी गई दवाएं लिवर में कोई समस्या तो पैदा नहीं कर रही हैं।

ऐसे टेस्ट जिनकी आपको शायद अभी जरूरत न हो

हो सकता है कि आप इंटरनेट पर या खबरों में नए या "उभरते हुए" टेस्ट के बारे में सुनें। रिसर्च के दृष्टिकोण से ये टेस्ट काफ़ी दिलचस्प हैं, लेकिन रोज़मर्रा की देखभाल में ये हमेशा उपयोगी नहीं होते।

कुछ उदाहरण हैं:

  • 1,5-एनहाइड्रोग्लूसीटोल (1,5-एजी): यह ब्लड शुगर के अचानक बढ़ने पर जानकारी देता है, लेकिन आम देखभाल में इसका ज़्यादा इस्तेमाल नहीं होता।
  • एडवांस्ड ग्लाइकेशन एंड प्रोडक्ट्स (AGEs): यह हाई ब्लड शुगर से होने वाले लंबे समय के नुकसान से जुड़ा है, लेकिन ज़्यादातर इसका इस्तेमाल सिर्फ रिसर्च में होता है।
  • माइक्रो आरएनए, मेटाबोलोमिक पैनल्स, या गट माइक्रोबायोम टेस्टिंग: इन पर अभी भी रिसर्च चल रहा है। ये टेस्ट अभी डायबिटीज़ की आम देखभाल का हिस्सा नहीं हैं।
  • जेनेटिक टेस्टिंग (जैसे एमओडीवाई * या टाइप 2 डायबिटीज़ के जोखिम वाले जीन्स के लिए): इसका इस्तेमाल सिर्फ़ दुर्लभ या कुछ खास मामलों में किया जाता है, जैसे कि बहुत कम उम्र में डायबिटीज़ वाले मरीज़ों में या ऐसे लोगों में जिनके परिवार में डायबिटीज़ का तगड़ा इतिहास रहा हो। * एमओडीवाई (मैच्योरिटी-ऑनसेट डायबिटीज़ ऑफ़ द यंग) ​​डायबिटीज़ का एक दुर्लभ और आनुवंशिक प्रकार है।
  • एचओएमए (होमोस्टैटिक मॉडल असेसमेंट) आईआर टेस्ट: यह उन लोगों में डायबिटीज़ का जल्दी पता लगाने में मददगार है, जिनमें इंसुलिन रेजिस्टेंस होने का शक हो और जिनमें डायबिटीज़ का जोखिम ज़्यादा हो। यह टेस्ट सब स्थितियों में उचित नहीं है और इसकी सलाह सभी लोगों की स्क्रीनिंग के लिए नहीं दी जाती।

अपने डॉक्टर से बात करें कि क्या आपको इन "कभी-कभी किए जाने वाले" टेस्ट में से क्या किसी टेस्ट को करवाने की ज़रूरत है, खासकर यदि आपका निदान स्पष्ट नहीं हो या आपका ब्लड शुगर के स्तर पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा हो, या फिर जब आपका एचबीए1सी और आप जो महसूस कर रहे हैं, वे मेल न खाते हों। डायबिटीज़ का प्रबंधन सिर्फ़ ब्लड शुगर पर नज़र रखने तक सीमित नहीं है। आपके गुर्दों, आँखों, हृदय, तंत्रिकाओं और आपकी समस्त सेहत पर ध्यान देना चाहिए। आपको हर तरह के टेस्ट करवाने की ज़रूरत नहीं है, सिर्फ़ उन्हीं टेस्ट पर ध्यान दें जो आज़माए हुए हैं और जो आपको और आपकी देखभाल करने वाली टीम को कारगर फ़ैसले लेने में मदद करते हैं। आपको कभी किसी टेस्ट या उसके महत्व के बारे में कोई सवाल हो तो अपने डायबेटोलॉजिस्ट या एंडोक्रिनोलॉजिस्ट से पूछें। संकोच न करें, किसी भी सवाल को पूछना बेवकूफी न समझें। जानकारी प्राप्त करना हमेशा बेहतर है।

यहां बताए गए कुछ शब्दों के मतलब को बेहतर ढंग से समझने के लिए, हमारी 'डायबिटीज़ शब्दावली' (ग्लॉसरी) देखें : https://www.patientsengage.com/conditions/diabetes-terms-explained

संदर्भ:

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17/May/2026
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